बचपन की तस्वीर देख रही थी साथ ही देख रही थी चेहरे की वो मासूमियत वो निश्छलता, फिर खुद को पलटकर आईने में देखा गौर से देखा.. मुझे चेहरे पे कही भी वो मासूमियत वो भोलापन नज़र नहीं आया। नज़र आई तो बस कुछ चालाकियां, हैरानियां,बेचैनियां और आँखों से लिपटे हुए कई रतजगे।
मुझे याद है अभी एकदिन मम्मी से किसी बात पर बहुत जोर से लड़ाई हुई थी गुस्से में मैंने उन्हें बहुत सुना दिया था वो चुप थी जानती थी कि मैं जबतक मन मे भरा हुआ खाली नहीं करूँगी शांत नहीं हो पाऊंगी और कुछ देर बाद बोलते-बोलते जब मैं रो पड़ी तो उन्होंने अपनी गोद मे लिटा दिया मुझे और सिर को सहलाते हुए बोली - "पता है जब तुम बहुत छोटी थी और तुतलाकर बोलती थी तब शाम के वक़्त अक्सर जब मैं चूल्हे पर रोटी बनाने बैठती तो तुम वही मेरे पास आकर बैठ जाती और जब चूल्हे में फूंक मारते वक़्त धुएं से मेरी आँखों मे पानी बहता तो मेरे साथ तुम भी जोर-जोर से फूंक मारने लगती पर तुम्हारी फूंक पहुच ही नहीं पाती लकड़ी तक तब तुम मेरे आँसू पोछ कर कहती कि जब मैं बड़ी हो जाऊंगी ना तो तुम्हारे लिए आग जलाऊंगी" बताते हुए मम्मी हँसने लगी और मैं और जोर से रोने।
इस किस्से को याद करती हूं तो लगता है कि वो मासूमियत वो निष्कपटता उसदिन चूल्हे के उस धुएं के साथ ही हवा में कही विलीन हो गयी अब तो बस दुनियादारी से लिपटा हुआ एक बेरंग चेहरा नज़र आता है मुझे आईने में जो बिल्कुल भी उस बचपन वाली तस्वीर सा मासूम नज़र नहीं आता।
पता नहीं ऐसा क्या पाना था जिसकी खातिर इतना कुछ खो बैठे।
#Uncertain_feelings
Rekha Suthar
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