सुनहरे बालों वाली लड़की के नाम ❣️
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वो मेरी स्कूल के गेट के बाहर एक कच्चे से झोपड़ी नुमा घर मे अपने परिवार के साथ रहती थी। उस घर पे सारे पुरुष दिनभर लोहे को पीट-पीटकर औजार बनाते और महिलाएं उन औजारों को पूरे गाँव मे घर-घर बेचने जाती।
ये सब मैंने पहले कभी नोटिस नहीं किया था कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई उस तरफ ध्यान देने की वैसे भी फुटपाथ पर रहने वालों पर हम कितना ध्यान दे पाते हैं ? सो मैंने भी नही दिया था कभी।
हर रोज शाम को हम स्कूल के ग्राउंड में सॉफ्टबॉल की प्रैक्टिस करने जाती थी और शॉट मारते हुए हर रोज हमारी बॉल एक बार तो उसके घर मे चली ही जाती और उस बॉल के चक्कर मे हर रोज मेरी उस लड़की से लड़ाई होती।
एक बार तो बात इतनी बिगड़ गयी के हम एकदूसरे को मारने पीटने पर आ गए।
जब हम पर कोई रौब जाड़ता है तो हमारा ईगो कितना हर्ट हो जाता है और फिर उस ईगो को शांत करने के लिए हम कब अपने स्तर से नीचे गिरने लगे जाते है पता ही नहीं चलता.. मेरे साथ भी उसदिन ऐसा ही हो रहा था।
मुझसे ये भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि उस मामूली सी लड़की की इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि वो मुझे हाथ भी लगाए.. अहंकार के भी कितने रूप होते है ना ये उनमें से एक था।
अब तो ये रोज की कहानी हो चुकी थी एकदिन मुझे परेशान देखकर पापा ने मुझसे पूछा कि क्या हुआ तो मैंने उन्हें सारी बात बताई तो पापा ने कहा कि ऐसी बात है तो एकबार उसके पास जाकर उससे बात करो दोनों बैठकर इसका रास्ता निकालो लड़ाई से तो कुछ नहीं मिलेगा और पता नहीं मेरे मुंह से ये क्यों निकला मैंने तुरंत ही जवाब दिया 'पापा, वो लड़की मेरे बराबर की नहीं है ना ही वो बात करने के लायक है'।
आज अगर मैं वहा होती तो पापा की तरह मैं भी उस रेखा की सोच पर हँसती और उसे डांट लगाती पर अभी तक उसको ये समझ नहीं थी कि इंसान को उसके आचरण को देखकर जज करना चाहिए ना कि उसकी संपत्ति और कपड़े देखकर।
पापा ने समझाते हुए आगे कहा की 'मुझे मेरे काम के सिलसिले में हर रोज तरह-तरह के लोगों से मिलना होता है वो बड़े मकानों में रहने वाले भी होते है तो कुछ कच्चे घरों में रहने वाले भी है वो लोग मुझे देखकर कुर्सी-टेबल की व्यवस्था करने में लग जाते है पर इतने में मैं वही उनके पास जमीन पर जाकर बैठ जाता हूं तो क्या मैं छोटा हो गया ?
वो लोग थोड़ा असहज हो जाते है पर मेरे सहज व्यवहार से वो अपनेआप ही सहज होने लग जाते है।
किसी ने बड़ी अच्छी बात कही है कि 'बड़ा इंसान वही होता है जो सामने वाले को कभी छोटा महसूस ना करवाये'
तुम समझदार हो और इसका हल भी तुम्हारे पास ही है.. मैं एकदम चुप थी मुझे समझ आ गया था पापा क्या कहना चाह रहे है.. तभी मम्मी ने बीच मे बोलते हुए सुझाव दिया कि कल उसको भी अपने साथ खेलने बुला लेना मम्मी का ये सुझाव सही लगा मुझे।
अगले दिन शाम को मैं प्रेक्टिस से पहले उसके पास गई वो मेरे सामने गुस्से से आई उसको लगा था मैं लड़ने आयी हूं जब मैंने उससे पूछा हमारे साथ खेलोगी ? कुछ देर की खामोशी के बाद उसने पूछा 'मैं खेल सकती हूं क्या तुम्हारे साथ ? मैंने कहा हां आ जाओ उसने हाथ में पकड़ी हुई करछी वही फेक दी और हमारे साथ खेलने आ गयी ।
उसदिन मुझे उससे थोड़ी जलन भी हुई पर ज्यादा अफसोस हुआ क्योंकि वो एक बहुत अच्छी खिलाड़ी थी काश वो स्कूल में पढ़ती तो हमारी टीम को एक और शानदार खिलाड़ी मिलता।
उसके बाल एकदम सुनहरे थे चेहरे पर गज़ब का तेज था
उसकी आँखें बहुत सुंदर थी जिसपे कोई भी मोहित हो जाये वो मेरी उम्र की ही थी लहंगा चोली पहनती थी दिनभर घर का काम करती तेज धूप में औजार बेचने जाती और शाम होते ही मेरे आने का इंतजार करती।
हम दोनों बहुत अच्छी दोस्त बन चुकी थी हम बातें करते थे मगर उसने कभी अपने बारे में कोई उदासी वाली बात नहीं कही शायद उसको पता ही नहीं था उदास और दुखी होने की वजह क्या होनी चाहिए वो सुबह पाँच बजे उठकर घर के कामों में जुट जाती फिर अपने पापा के साथ औजार बनाने में मदद करती फिर अपनी माँ और चाची के साथ भरी दोपहर में औजारों को बेचने निकलती और शाम को हमारे साथ खेलने के बाद फिर से उन्ही कामों में उलझ जाती।
मैंने कभी उसके चेहरे पे शिकायतों की शिकन या उदासी नहीं देखी उसने जाने-अनजाने मुझे वो सारी बातें सिखाई जो शायद मुझे कभी कही से सीखने को नहीं मिलती।
हमारे पास ज़रूरतों की सारी चीजें होने के बावजूद हमारी परेशानी और शिकायतों की लिस्ट कम नहीं होती और उसके पास कुछ न होते हुए भी चेहरे से मुस्कराहट नहीं हटती।
एकदिन वो शाम को खेलने नहीं आयी मैं उसे बुलाने गयी तो उसके पापा ने कहा अब वो बाहर नहीं निकलेगी दो दिन बाद उसकी शादी है मैं कुछ बोल नहीं पाई वहा से चली गयी रातभर मैं सिर्फ उसके बारे में सोचने लगी।
सुबह के 11 बजे थे मैं क्लास में थी पर मेरी नज़र सामने उसके घर की तरफ ही टिकी हुई थी। उसकी बिदाई की तैयारी हो रही थी क्लास खत्म होते ही मैं भागकर सामने वाली दीवार पर चढ़कर कर उसके घर मे झांकने लगी वो हाथ भर घूघट निकाले अपने पति के साथ विदा हो रही थी सब रो रहे थे मेरी आँखें भरी हुई थी इस अनजान लड़की के लिए पता नहीं दिल मे कब इतनी जगह बन गयी थी, उसने गाड़ी में बैठते वक़्त मेरी तरफ देखा था उसने उसी मुस्कान के साथ अपना हाथ हिलाकर मुझे बाए कहा मैंने भी जवाब में मुस्कराकर अपना हाथ हिलाया आंसुओ की बूंदे अब मेरे गालों पर लुढक आयी थी।
वो सुनहरे बालों वाली लड़की जाते-जाते मुझे बहुत कुछ सीखा गयी उसके बाद मैंने फिर उसे कभी नहीं देखा आज शुकराने का अवसर मिला तो मन मे कई सारे खयालों के साथ वो लड़की भी आई तो सोचा आज उसी धुंधली यादों के खोई लड़की को शुक्रिया कहा जाए।
'सुनो,सुनहरे बालों वाली लड़की तुम्हारा शुक्रिया तुम जहाँ भी हो बस खुश रहना मुस्कराती रहना, ❣️
Rekha Suthar
#शुकराना
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