Skip to main content

वो बस एक याद बन के रह गया।

  


उस दिन मेहबूब स्टूडियो में सुशांत अपनी एक फ़िल्म का प्रमोशन करने आए थे। ख़ुशक़िस्मती से मैं भी वहाँ दर्शक बनकर पहुँची थी। पहले अक्सर मैं अपने साथ एक डायरी रखती थी, जिसमें किसी की कही अच्छी बातों को नोट करती थी। करीब 1 घंटे के प्रोग्राम के बाद सभी वहाँ से निकल गए थे। मैं भी नीचे गेट तक पहुँची ही थी कि मुझे याद आया कि मैं अपनी डायरी उसी हॉल में भूल आई हूँ, तो तुरंत भागकर उसे लेने गई।


डायरी लेकर जब लौटी, तो देखा—सुशांत वहीं थोड़ी दूर अपनी वैनिटी वैन के गेट पर खड़े थे। बेहद आम सा दिखने वाला एक लड़का, जिसमें कुछ ऐसा था जो उसे सबसे ख़ास बना देता था। उसकी सादगी देखकर मैं ठिठक गई, नज़रें हटानी चाहीं, पर न हटा सकी। शायद पहली बार जाना कि किसी को ताड़ना क्या होता है।


उसकी तरफ़ जाने को कदम बढ़ाए ही थे कि उसके गार्ड ने मुझे रोक लिया। मेरी गार्ड से होती बातचीत देख सुशांत की नज़र मुझ पर पड़ी, तो मैंने इशारे से उसे मिलने के लिए कहा। सुशांत ने गार्ड को इशारा करते हुए कहा, “आने दो उसे।”


और मैं लगभग भागते हुए उसके पास जा पहुँची। ऐसा नहीं है कि मैं सुशांत की बहुत बड़ी फैन हूँ, लेकिन उसकी मासूमियत और सादगी की मुरीद रही हूँ।


उसने पूछा - “क्या आप पत्रकार हैं?”

मैंने ‘ना’ में सिर हिलाया।


दरअसल उन दिनों मैं सच में कुछ भी नहीं कर रही थी। उससे हुई करीब 15-20 मिनट की बातचीत में उसने मुझे एक पल भी यह एहसास नहीं होने दिया कि वह एक बहुत बड़ा सेलिब्रिटी है और मैं एक आम लड़की। वह मुझसे बात करते हुए बिल्कुल मेरे जैसा ही लग रहा था।


मुझे उससे और बातें करनी थीं, लेकिन उसके शूट का टाइम हो गया था, इसलिए वह अलविदा कहकर अपनी वैनिटी में चला गया।


जाने से पहले मैंने यूँ ही पूछ लिया था—

“दुबारा कब मिलोगे?”


उसने पलटकर देखा और कहा—

“ये ज़िंदगी बहुत लंबी है, रेखा। किसी न किसी मोड़ पर ज़रूर मिलेंगे।”


पर वह मोड़ कभी आया ही नहीं। वह किसी और दुनिया का हो गया।


अभी यूट्यूब पर स्क्रॉल करते हुए उसकी एक फ़िल्म सामने आ गई, तो देखने लग गई।

फिल्में मैं बहुत चुनिंदा देखती हूँ। हर कहानी दिल को छू नहीं पाती, और हर सुपरहिट फिल्म मुझे पसंद नहीं आती। लेकिन कुछ ऐसी फ़िल्में भी रही हैं, जो भले ही बॉक्स ऑफिस पर कमाल न कर पाईं, लेकिन दिल में बस गईं। पर जब बात सुशांत की आती है, तो कोई चुनाव नहीं होता—बस देख लेती हूँ।


सुशांत अब सिर्फ़ यादों में हैं, लेकिन उसकी सादगी, उसकी आँखों की चमक, और वो चंद लम्हों की बातचीत हमेशा के लिए मेरे दिल में बस गई है।


वह मुलाक़ात महज़ कुछ मिनटों की थी, लेकिन उसकी छाप मेरे मन पर ज़िंदगी भर के लिए रह गई। अगर उस दिन मेरी डायरी कॉन्फ्रेंस हॉल में नहीं छूटती, तो शायद सुशांत से इस तरह बात करने का मौका ही नहीं मिलता।


उसका जाना अब भी एक अधूरी कहानी जैसा लगता है। लेकिन जब भी उसकी फ़िल्म स्क्रीन पर चलती है, लगता है जैसे वह कहीं आस-पास ही हैं—किसी मोड़ पर फिर मिलने का वादा निभाने के लिए।

…रेखा सुथार 

Comments

Popular posts from this blog

"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी  का कप हाथ में लिए  याद आ रहे है वो  सर्दी के सुहाने दिन जब  नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय  दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार

"मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं"

~ मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं ना मैं शायर हूँ ना कवि हूँ मैं लिखा जो कभी दिल को छु जाए तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना प्यार लिखती हूँ ना नफरत लिखती हूँ  जो कभी पढ़ लो जज्बात तुम तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना सच लिखती हूँ ना झूठ लिखती हूँ  जो जैसा दीखता है वैसा ही लिखती हूँ दिख जाए जो सादगी लफ़्ज़ों की तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना जख्म लिखती हूँ ना दर्द लिखती हूँ बेजुबां लबो की आवाज लिखती हूँ जो सुन सको तुम भी वो ख़ामोशी  तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं रेखा ~

मुस्कान में अभिनय क्यों है ?

आँसुओ में सच्चाई मुस्कान में अभिनय क्यों है कहते है ज़िंदा है तो ज़िन्दगी से बेज़ार क्यों है लिखा नहीं ज़िन्दगी में साथ जिनका उन्हीं से हर मोड़ पे खुदा मिलवाता क्यों है   बेज़ुबां मूर्तियों के आगे भरे करोडो के भंडारे है उसी की देहलीज पे नन्हे हाथ तरसते क्यों है देखी है मैंने भी शहरो की चमक धमक पर इस रौशनी में चेहरे पहचानने मुश्किल क्यों है कहते है वो ज़माना गया जब मोहोब्बत सच्ची होती थी फिर आज भी सूखे हुए फूल किताबो में मिलते क्यों है.. रेखा सुथार