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बचपन की पिटाई


मैं बचपन से ही बहुत शरारती रही हूँ.. गाँव में मेरा रॉब पड़ता था अपनी स्कुल की मैं हीरो थी कोई भी काम मेरे और मेरी टीम के बिना नहीं होता था इतनी दबंग थी के गाँव में कोई भी पंगा लेने से पहले चार बार सोचता था !
पर किसी को भी ये मालूम नहीं था के आम तौर पे जहा लोग दिन में तीन बार खाना खाते है वैसे ही मैं दिन में तीन बार मम्मी के हाथ की मार खाती थी.. मेरी मार खाने का एक कमरा तय था जब भी मैं कोई शरारत करती मम्मी हाथ पकड़ कर मुझे उसी कमरे में ले जा कर मेरी अच्छे से खातिर करती बस कभी कभी पापा की वजह से बच जाती..
एक दिन की बात है गाँव में तब बहुत कम घरो में टीवी थी आस-पास के पडौसी सब हमारे घर पे शाम को "रामायण" आती थी तो सब देखने आते थे पूरा हॉल लगभग भर जाता था ! उस दिन मैं बहुत खुश थी की मेरी सिर्फ दो बार ही पिटाई हुई और अब तो रात हो गई थी अब तो थोड़ी देर में सब सो जायेंगे तो मैं भी सबके बीच बैठी सब शांति से रामायण देखने लग गयी तभी मुझे प्यास लगी सामने की तरफ मिट्टी के दो मटके भरे हुए थे मैं उनकी तरफ बढ़ी तो मेरी आंटी वही बैठी हुई थी बोली रुक मैं पिला देती हूँ मैंने कहा आप परेशान ना हो मैं पी लुंगी.. मैं सबके बीच में से वहा पहुची और जैसे ही ग्लास लेकर हाथ अंदर डाला तो वापस बाहर निकल ही नहीं पाया बहुत कोशिश की पर मटका ऊपर था और मैं इत्तू सी, और जैसे ही मैंने हाथ बहार निकालने के लिए हाथ को खींचा साथ में मटका भी आ गया और सब तरफ पानी पानी मैंने तुरंत मम्मी के सामने देखा और उनकी घूरती हुई नज़रो को देखते ही मैंने हाथ में जो ग्लास था उसमे से पानी पिया और चुप चाप उस कमरे में चली गयी सोचा सबके सामने पिटते पिटते ले जाए इससे बेहतर खुद ही चली जाऊ !
इस बात को आज भी घर पे जब हम सब इकठ्ठा होते है तो मुझे बहुत छेड़ते है, लेकिन मेरे तीनो भाई बहन को ये शिकायत भी रही है शुरू से की मम्मी सबसे ज्यादा लाड मुझसे ही करती है !

रेखा सुथार


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