ये तस्वीर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी 'लाल टिब्बा' की हैं। पिछले साल लोकडाउन के ठीक पहले पूरे परिवार के साथ गए थे।
मसूरी के सारे स्थानीय जगह घूमने के बाद आखिर में लाल टिब्बा देखने की बारी थी। हमने अपनी प्राइवेट कार से लाल टिब्बा की और चढ़ाई शुरू करी। हालांकि की कई लोग ये चढ़ाई पैदल भी करना पसंद करते है लेकिन क्योंकि हम लोग बहुत थक गए थे तो कार से ही जाना तय किया। हमने मुश्किल से आधा किलोमीटर की ही चढ़ाई की होगी की आगे देखा गाड़ियों का पूरा जाम लगा हुआ था सुनने में आया कि ये जाम 3-4 घंटे तक खुलना नहीं है हमारी गाड़ी के पीछे और भी कई गाड़ियों की कतार लग गयी थी अब ना आगे जाने का रास्ता था ना पीछे।
मुझे ढलते सूरज के साथ पहाड़ों की शाम की खूबसूरती को देखना बहुत अच्छा लगता है और ये मैं मिस नहीं करना चाहती थी।
कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ तो अपना मोबाईल लेकर मैं अकेले ही चल पड़ी।
मुझे 4 किलोमीटर की चढ़ाई करनी थी और करीब एक किलोमीटर पार करके मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूं। मैंने साथ मे ना पैसे लिए और ना ही पीने को पानी रास्ते मे बीच मे कही कोई दुकान भी नहीं थी। थोड़ा आगे चलने पर किनारे की तरफ़ एक कार दिखी पूरा सरदार परिवार था जो कि पहाड़ों की तस्वीरें ले रहे थे बच्चें कार के बाहर अपने ही खेल में मशगूल थे।
मैंने पास जा के सरदार जी से कहा - 'सर,पीने को पानी मिलेगा थोड़ा' ?
'बेटा जी थोड़ा क्यों खूब सारा मिल जाएगा' वो एक गज़ब की मुस्कान के साथ बोले।
उनकी पत्नी ने कार के अंदर से एक बिसलेरी की बॉटल निकाली और मुझे दे दी और उन्होंने वो बॉटल मुझे मेरे पास ही रखने को बोला। साथ ही सरदारजी ने मुझे एक अमरूद और सिंग दाने का एक छोटा सा पैकेट भी दिया बोले सफर अच्छा कटेगा।
मुझे समझ नहीं आ रहा था किन शब्दों में उन्हें 'शुक्रिया' कहती।
मैं बस थेंक यूं कहके वहा से चल पड़ी।
जब भी किसी सफर में ऐसे अनजान लोगों से राब्ता होता है तो सोचती हूं कि इस दुनिया को बड़े-बड़े इंजीनियर और आर्किटेक्ट से ज्यादा ऐसे 'संवेदनशील' और 'उदार' लोगों की ज्यादा जरूरत है।
रास्ते में कुछ देर आराम करने बैठी वहा पास में एक प्यारा सा कपल सेल्फ़ी ले रहा था लड़की बेहद खूबसूरत थी उसका सांवला रंग सूरज की रौशनी में और आकर्षक लग रहा था लड़का कमाल का हैंडसम था।
लड़के ने मुझे आवाज़ दी - 'एक्सक्यूज मी.. क्या आप हमारी एक तस्वीर लेंगे' ?
मैंने मुस्कार के कहा 'क्यों नहीं आप जितनी कहोगे उतनी ले लुंगी'
आखिर में उन्होंने अपने फोन में मेरे साथ भी एक सेल्फ़ी लेने की दरख्वास्त की हम तीनों की वो प्यारी सेल्फी आयी थी शायद उनके फोन की मेमोरी में आज भी मेरी तस्वीर होगी।
चलते-चलते आखिर वो मंजिल आ ही गयी जहाँ चढ़ाई शुरू करते वक़्त पहुच पाना कितना मुश्किल सा लग रहा था।
कुछ देर आसपास की चीजों को निहारने के बाद ऊपर जहां वो लाल-टिब्बा लिखा है उस तरफ बढ़ी वहा जैसे ही ऊपर चढ़ने लगी तो उस दीवार की खिड़की से एक भारी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी
- 'मैडम ऊपर जाना है तो किराया देना पड़ेगा' मैंने पलट कर देखा ये एक छोटा सा रेस्ट्रोरेंट था और वो उसका मालिक लग रहा था।
- मैंने पूछा कितना किराया है ?
- 200 रुपये और अगर किराया नहीं देना चाहते तो मेरे रेस्ट्रोरेंट से कुछ खरीदना पड़ेगा - उसने जवाब दिया ।
ये सुनकर पहले तो गुस्सा आया फिर लगा कि यही इनकी रोजगारी हैं सीजन के वक़्त नहीं कमाएंगे तो कब कमाएंगे।
अब जैसा कि मैंने शुरू में ही बता दिया था मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूं कुछ भी नहीं लायी थी अपने साथ कुछ देर के लिए खयाल आया कि काश वो सरदार जी मुझे यहाँ मिल जाते 😄
खैर अपनी सारी परेशानी बताने के बाद भी वो भैया नहीं माना तो मैं वही सामने पड़ी कुर्सी पर जाकर बैठ गयी और पहाड़ों को निहारने लगी।
कुछ देर के बाद वो रेस्टोरेंट वाले भाईसाब मेरे पास आये और और थोड़े तंजिया अंदाज़ में बोले -
- 'एक शर्त पर ऊपर जाने दूंगा... तुम्हे अपना मोबाईल यही छोड़ के जाना होगा मंजूर हो तो बोलो'
मेरे मायूस हुए चेहरे पे एकदम हँसी खिल गयी मैंने कहा मंजूर है ये लो मेरा फोन और मैं दौड़ पड़ी ऊपर।
पीछे से चिल्लाते हुए बोले अरे फ़ोन का टोकन तो लेती जाओ मैंने पीछे मुड़कर हांफते हुए जवाब दिया 'ज़रूरत नहीं है, मुझे यकीन है मेरा फोन मुझे मिल जाएगा'।
जवाब में उन्होंने सिर्फ एक मुस्कान दी वो 'चिंता मत करो' वाली मुस्कान।
मैं ऊपर लोगों की भीड़ से थोड़ा दूर जा के बैठ गयी।
सूरज को डूबने में अभी थोड़ा वक्त था वो एक बड़ी सी बिंदी की तरह दूर उस पहाड़ पर से चमक रहा था मानो उसे मेरे ही आने का इंतज़ार था... होता भी क्यों नहीं हम पुराने यार जो ठहरे।
डूबते सूरज के साथ शाम की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। जैसे-जैसे रौशनी कम होती जाती है पहाड़ों में एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता है।
हमारे जीवन मे किसी सबसे प्रिय इंसान का हमें बिना कुछ कहे खामोशी से हाथ छुड़ा के चले जाने के बाद जो सन्नाटा हमारे भीतर जन्म लेता है ठीक वैसा ही सन्नाटा था ये।
मेरे जीवन की डिक्शनरी में 'जाना' का पर्यायवाची हमेशा 'पीड़ा' लिखा रहेगा। एक गहरी पीड़ा जिसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता।
सूरज डूब चुका था अंधेरा चारों तरफ अपनी बाहें फैला चुका था पंछी अपने घोंसले में लौट रहे थे मैंने मन ही मन उन पहाड़ों को अलविदा कहा और वहा से लौट आयी।
************ #रेखा_सुथार
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