"वो जानती थी कि सबसे ज़रूरी क्या है"
कुछ तकनीकि खराबी की वजह से ट्रेन एक स्टेशन पर करीब बीस मिनट तक खड़ी रही। आज रोज के मुकाबले लोकल ट्रेन में भीड़ कम थी एकदम उबाऊ सी शाम थी ये या शायद मेरा मन ही आज ऐसा था कि मुझे हर चीज उबाऊ सी लग रही थी।
मैं रोज की तरह खिड़की पर सिर टिकाए हाथ में किताब लिए (अक्सर कानों में इयरफोन होते है मगर आजकल कुछ अधूरी रही किताबों को धीरे-धीरे पूरा कर पाने की कोशिश कर रही हूं) एक पेरेग्राफ पर अटकी हुई थी तभी मेरी नज़र सामने के प्लेटफार्म पर बैठी एक करीब 16-17 साल की लड़की और उसी का हमउम्र लड़के पर पड़ी।
लड़का बेहद ही क्यूट था इस बेहद पर और ज्यादा जोर लगा ले तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी लेकिन थोड़ा सा ढीठ था 'क्यों' वो आगे बताऊंगी और लड़की बिल्कुल चंचल प्यारी सी बेहद शांत लग रही थी।
उस प्लेटफार्म पर मुश्किल से दो-चार ट्रेन आती होगी दिन में इस वजह से वहा लोग बिल्कुल ना के बराबर थे प्लेटफार्म लगभग खाली था।
वो दोनों एक बैंच पर बैठे थे लड़का किसी बात से बेहद नाराज़ लग रहा था और लड़की पूरी शिद्दत से उसे मनाने की कोशिश में लगी थी मानो उसकी गलती ना होते हुए भी वो उससे मिन्नतें कर रही है।
होता है ना अक्सर लगभग हम सबके साथ जब हमें हमारे किसी खास रिश्ते के खोने भर का अहसास होता है तो मन पे कैसे एक अजीब सा बोझ लद जाता हैं और उस बोझ से छुटकारा पाने के लिए हम वो सबकुछ करते है जो शायद कभी-कभी नागवार भी हो।
शायद वो लड़की भी वही कर रही थी शायद वो उसे खोने से डर रही थी मगर लड़का उतना ही ज़िद्दी और ढीठ था वो उसकी कोई भी बात सुनने और समझने को तैयार नहीं था उसने करीब तीन से चार बार उसका हाथ झटक दिया था जब लड़की उसे समझाने के लिए उसका हाथ पकड़ रही थी।
लड़की की आँखों मे आँसू थे पर वो पश्चाताप के बिल्कुल नहीं थे।
लड़की ने फिर से उसका हाथ पकड़ा और कुछ समझाना चाहा पर इसबार लड़का उसका हाथ छुड़ाकर वहा से जाने लगा लेकिन यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये थी कि लड़की उसके पीछे नहीं गयी वो वही उस बैंच पर बैठी रही उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
उसकी खामोशी शायद अब ये कह रही थी कि 'जाओ,अब मैं तुम्हे नहीं रोकूंगी दोस्ती/प्यार में रूठना-मनाना चलता रहता है मगर जो नाराज़गी अहम पर आ जाये ऐसे में उसे उसके अहम के साथ चले जाने देना चाहिए मैंने पूरी कोशिश की तुम्हे मनाने की लेकिन अब अगर तुम्हारा अहम ये चाहता है कि मैं तुम्हारे सामने गिरगिडाऊ तो ये नहीं होगा आखिर सेल्फ़रिस्पेक्ट भी कोई चीज होती है'।
लड़के ने थोड़ा आगे जाकर पीछे मुड़कर देखा तो लड़की वही बैंच पर बैठी हुई थी और वो बिल्कुल भी नहीं रो रही थी लड़के को लगा था कि लड़की फिर से मिन्नतें करती हुई उसके पीछे भागी आएगी लेकिन ये क्या उसने तो उसकी तरफ देखा तक नहीं।
लड़का पलटा और वापस लड़की की तरफ बढ़ा वो उसके सामने जाकर खड़ा हो गया उसने लड़के ने उससे बात करने की कोशिश की मगर लड़की ने जवाब में हाथ के इशारे से उसे जाने को कह दिया मानो वो कह रही हो कि "यक़ीकन तुम मेरी ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते हो मगर तुमसे भी ज्यादा अहम मेरे लिए मेरा स्वाभिमान है"।
उसे पता था कि लड़के का उसकी ज़िन्दगी में होना कितना जरूरी है मगर वो ये भी जानती थी कि सबसे ज़रूरी क्या है।
शायद लड़के को उसकी गलती का अहसास हो गया था वो लड़की के सामने कान पकड़कर खड़ा हो गया लड़की कुछ देर तक उसे एकटक देखती रहती है फिर वो लड़के का हाथ पकड़ कर उसे वहा से ले गयी।
थोड़ा आगे जाकर लड़की लड़के के बालों में हाथ फेरती है जिससे चिढ़कर लड़का उसका हेयर बैंड खोल देता है और उन दोनों की नोकझोंक फिर से चालू हो जाती है।
मैं उन्हें तबतक देखती रही जबतक वो मेरी आँखों से ओझल ना हो गए..
#किस्से_लोकल_के
कुछ तकनीकि खराबी की वजह से ट्रेन एक स्टेशन पर करीब बीस मिनट तक खड़ी रही। आज रोज के मुकाबले लोकल ट्रेन में भीड़ कम थी एकदम उबाऊ सी शाम थी ये या शायद मेरा मन ही आज ऐसा था कि मुझे हर चीज उबाऊ सी लग रही थी।
मैं रोज की तरह खिड़की पर सिर टिकाए हाथ में किताब लिए (अक्सर कानों में इयरफोन होते है मगर आजकल कुछ अधूरी रही किताबों को धीरे-धीरे पूरा कर पाने की कोशिश कर रही हूं) एक पेरेग्राफ पर अटकी हुई थी तभी मेरी नज़र सामने के प्लेटफार्म पर बैठी एक करीब 16-17 साल की लड़की और उसी का हमउम्र लड़के पर पड़ी।
लड़का बेहद ही क्यूट था इस बेहद पर और ज्यादा जोर लगा ले तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी लेकिन थोड़ा सा ढीठ था 'क्यों' वो आगे बताऊंगी और लड़की बिल्कुल चंचल प्यारी सी बेहद शांत लग रही थी।
उस प्लेटफार्म पर मुश्किल से दो-चार ट्रेन आती होगी दिन में इस वजह से वहा लोग बिल्कुल ना के बराबर थे प्लेटफार्म लगभग खाली था।
वो दोनों एक बैंच पर बैठे थे लड़का किसी बात से बेहद नाराज़ लग रहा था और लड़की पूरी शिद्दत से उसे मनाने की कोशिश में लगी थी मानो उसकी गलती ना होते हुए भी वो उससे मिन्नतें कर रही है।
होता है ना अक्सर लगभग हम सबके साथ जब हमें हमारे किसी खास रिश्ते के खोने भर का अहसास होता है तो मन पे कैसे एक अजीब सा बोझ लद जाता हैं और उस बोझ से छुटकारा पाने के लिए हम वो सबकुछ करते है जो शायद कभी-कभी नागवार भी हो।
शायद वो लड़की भी वही कर रही थी शायद वो उसे खोने से डर रही थी मगर लड़का उतना ही ज़िद्दी और ढीठ था वो उसकी कोई भी बात सुनने और समझने को तैयार नहीं था उसने करीब तीन से चार बार उसका हाथ झटक दिया था जब लड़की उसे समझाने के लिए उसका हाथ पकड़ रही थी।
लड़की की आँखों मे आँसू थे पर वो पश्चाताप के बिल्कुल नहीं थे।
लड़की ने फिर से उसका हाथ पकड़ा और कुछ समझाना चाहा पर इसबार लड़का उसका हाथ छुड़ाकर वहा से जाने लगा लेकिन यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये थी कि लड़की उसके पीछे नहीं गयी वो वही उस बैंच पर बैठी रही उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
उसकी खामोशी शायद अब ये कह रही थी कि 'जाओ,अब मैं तुम्हे नहीं रोकूंगी दोस्ती/प्यार में रूठना-मनाना चलता रहता है मगर जो नाराज़गी अहम पर आ जाये ऐसे में उसे उसके अहम के साथ चले जाने देना चाहिए मैंने पूरी कोशिश की तुम्हे मनाने की लेकिन अब अगर तुम्हारा अहम ये चाहता है कि मैं तुम्हारे सामने गिरगिडाऊ तो ये नहीं होगा आखिर सेल्फ़रिस्पेक्ट भी कोई चीज होती है'।
लड़के ने थोड़ा आगे जाकर पीछे मुड़कर देखा तो लड़की वही बैंच पर बैठी हुई थी और वो बिल्कुल भी नहीं रो रही थी लड़के को लगा था कि लड़की फिर से मिन्नतें करती हुई उसके पीछे भागी आएगी लेकिन ये क्या उसने तो उसकी तरफ देखा तक नहीं।
लड़का पलटा और वापस लड़की की तरफ बढ़ा वो उसके सामने जाकर खड़ा हो गया उसने लड़के ने उससे बात करने की कोशिश की मगर लड़की ने जवाब में हाथ के इशारे से उसे जाने को कह दिया मानो वो कह रही हो कि "यक़ीकन तुम मेरी ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते हो मगर तुमसे भी ज्यादा अहम मेरे लिए मेरा स्वाभिमान है"।
उसे पता था कि लड़के का उसकी ज़िन्दगी में होना कितना जरूरी है मगर वो ये भी जानती थी कि सबसे ज़रूरी क्या है।
शायद लड़के को उसकी गलती का अहसास हो गया था वो लड़की के सामने कान पकड़कर खड़ा हो गया लड़की कुछ देर तक उसे एकटक देखती रहती है फिर वो लड़के का हाथ पकड़ कर उसे वहा से ले गयी।
थोड़ा आगे जाकर लड़की लड़के के बालों में हाथ फेरती है जिससे चिढ़कर लड़का उसका हेयर बैंड खोल देता है और उन दोनों की नोकझोंक फिर से चालू हो जाती है।
मैं उन्हें तबतक देखती रही जबतक वो मेरी आँखों से ओझल ना हो गए..
#किस्से_लोकल_के

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