Skip to main content

देर सही, लेकिन सही जगह



आज किसी ज़रूरी काम से मलाड जाना था। घर से निकलते-निकलते पहले ही देर हो गई थी, और रास्ते में पोस्ट ऑफिस का एक काम भी निपटाना था। सोचा था कि 5-10 मिनट में काम हो जाएगा, लेकिन वहाँ पहुँचकर पोस्ट ऑफिस की हालत देखकर समझ आ गया कि दस मिनट में तो कुछ भी नहीं होगा।

मेरे आगे सिर्फ दो लोग खड़े थे, तो लगा कि मेरा नंबर जल्दी आ जाएगा, लेकिन जैसे ही मेरी बारी आई, इंटरनेट बाबू को कहीं जाने की जल्दी हो गई। करीब 15 मिनट इंतज़ार के बाद इंटरनेट चालू हुआ, और मेरा काम प्रोसेस में ही था कि एक बुजुर्ग महिला आईं और बोलीं, “बेटा, मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता। क्या मैं पहले अपना काम करवा लूँ?”

मैं कुछ कहती, इससे पहले मेरे पीछे खड़े आदमी ने सख्त आवाज़ में कहा, “हम लोग कब से लाइन में खड़े हैं। अगर आपने इन्हें पहले जाने दिया, तो फिर आपको भी अपना काम हमारे बाद ही करवाना होगा।”

मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप आंटी को अपनी जगह दे दी। खुद जाकर तीन लोगों के पीछे खड़ी हो गई।

“आजकल मुझे हर बुरी लगने वाली बात पर चुप रहना ही सही लगता है।”

कई बार मन उलझा होता है, और जब उसे सुलझाने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता, तो ऐसे में हमारे पास तीन ही विकल्प होते हैं—पहला, सामने वाले को उसी के अंदाज़ में जवाब देना; दूसरा, उसे समझाने की कोशिश करना कि वह गलत है; और तीसरा, चुप रह जाना। पहले दोनों विकल्पों में बहस होती, जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं थी।

इसीलिए, जवाब देने में सक्षम होने के बावजूद कई बार हम चुप रहना ही चुनते हैं—क्योंकि उस समय यही सबसे सही विकल्प लगता है।

जिस बुजुर्ग महिला को मैंने आगे खड़ा किया था, वो अब काउंटर पर बैठे कर्मचारी से बहस कर रही थीं। बहस के बीच ही वो रोने लगीं और वहीं पास रखी लकड़ी की बेंच पर बैठ गईं। वो बैठी-बैठी मराठी में कुछ बड़बड़ा रही थीं। मैंने अपने आगे खड़े लड़के से पूछा, “ये क्या कह रही हैं? इनका काम क्यों नहीं हुआ?”

उसने जवाब दिया, “ये बिजली का बिल भरने आई हैं, लेकिन इन्हें कहा जा रहा है कि यह बिल यहाँ नहीं, दूसरे ऑफिस में जमा होगा।”

अब तक मेरा नंबर आ चुका था, और दस मिनट में मेरा काम पूरा हो गया। मैंने देखा कि आंटी धीरे-धीरे लकड़ी के सहारे दूसरे ऑफिस की तरफ़ बढ़ रही थीं।

मैंने अपनी स्कूटी निकाली और उनके पास जाकर कहा, “आइए, मैं छोड़ देती हूँ आपको।”

सुनते ही उन्होंने फुर्ती से अपनी लकड़ी उठाई और मेरे कंधे का सहारा लेकर आराम से पीछे बैठ गईं। वहाँ पहुँचकर देखा, तो वहाँ भी लंबी लाइन लगी हुई थी। मैंने घड़ी देखी और सोचा—अब तो पहले ही देर हो चुकी है, तो और पाँच-दस मिनट सही।

मैंने आंटी से उनका बिल और पैसे लिए और उन्हें वहीं कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। मेरे आगे चार लोग खड़े थे। बगल में दो लोग बुरी तरह झगड़ रहे थे और एक-दूसरे के माँ-बाप-बहनों को गालियाँ दे रहे थे, जिनका उस झगड़े से कोई लेना-देना नहीं था।

पूछने पर पता चला कि एक साहब विमल खाने ही वाले थे कि तभी पीछे खड़े दूसरे साहब से हल्का-सा धक्का लग गया, और उनकी “दाने-दाने में केसर मिली विमल” ज़मीन पर बिखर गई। बस, फिर क्या था—महाभारत छिड़ गई।

ख़ैर, मेरा नंबर आ गया। बिल के दिए पैसों में 75 रुपये कम थे, तो मैंने अपनी जेब से निकालकर दे दिए। जो पैसे उन्होंने दिए थे, उनमें ज़्यादातर दो और पाँच रुपये के सिक्के थे, जो साफ़ बता रहे थे कि ये महीनों से जोड़कर रखे गए थे।

काउंटर पर बैठे लड़के ने पैसे गिनते हुए मुझे हैरानी से देखा और मज़ाकिया लहज़े में कहा, “मैडम, गुल्लक तोड़कर पैसा लाया है क्या?”

अब मैं उसे क्या जवाब देती? इस बार भी मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा।

बिल भरने के बाद मैंने आंटी से पूछा, “अब मैं आपको कहाँ छोड़ सकती हूँ?”

उन्होंने एक गहरी सांस ली और बोलीं, “बस स्टॉप पर छोड़ दो बेटा, वहाँ से मैं चली जाऊँगी।”

मैंने ज़्यादा सवाल नहीं किए, उन्हें पीछे बिठाया और बस स्टॉप की तरफ बढ़ गई। रास्ते में वो धीमी आवाज़ में कुछ बड़बड़ा रही थीं, लेकिन इस बार मराठी नहीं, हिंदी में—

“आजकल के लोग बस देखते हैं, मदद कोई नहीं करता… भगवान तुम्हारा भला करे, बेटा…”

बस स्टॉप पर पहुँचकर मैंने स्कूटी रोकी। वो उतरीं, लेकिन थोड़ा लड़खड़ा गईं, तो मैंने उन्हें सहारा दे दिया। उनके चेहरे पर थकान और बेबसी साफ़ झलक रही थी, लेकिन जब उन्होंने मेरी ओर देखा, तो हल्की-सी मुस्कान आ गई।

जेब में हाथ डालकर कुछ निकालने लगीं—शायद पैसे देने के लिए।

मैंने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “अरे नहीं आंटी, बस दुआ दीजिए।”

वो कुछ पल खामोश रहीं, फिर सिर पर हाथ रखकर बोलीं, “बेटा, तुम्हारी जिंदगी में कभी कोई कमी ना आए…”

मैंने स्कूटी स्टार्ट की और एक बार पीछे मुड़कर देखा—बस स्टॉप पर बैठी वो बुजुर्ग महिला अब अपनी दुनिया में वापस लौट चुकी थीं। मैं तेज़ी से आगे बढ़ गई, लेकिन दिल में एक सुकून था—

शायद आज मैं थोड़ी लेट सही, लेकिन सही जगह पहुँची थी।

….. रेखा सुथार 

Comments

Popular posts from this blog

वो बस एक याद बन के रह गया।

   उस दिन मेहबूब स्टूडियो में सुशांत अपनी एक फ़िल्म का प्रमोशन करने आए थे। ख़ुशक़िस्मती से मैं भी वहाँ दर्शक बनकर पहुँची थी। पहले अक्सर मैं अपने साथ एक डायरी रखती थी, जिसमें किसी की कही अच्छी बातों को नोट करती थी। करीब 1 घंटे के प्रोग्राम के बाद सभी वहाँ से निकल गए थे। मैं भी नीचे गेट तक पहुँची ही थी कि मुझे याद आया कि मैं अपनी डायरी उसी हॉल में भूल आई हूँ, तो तुरंत भागकर उसे लेने गई। डायरी लेकर जब लौटी, तो देखा—सुशांत वहीं थोड़ी दूर अपनी वैनिटी वैन के गेट पर खड़े थे। बेहद आम सा दिखने वाला एक लड़का, जिसमें कुछ ऐसा था जो उसे सबसे ख़ास बना देता था। उसकी सादगी देखकर मैं ठिठक गई, नज़रें हटानी चाहीं, पर न हटा सकी। शायद पहली बार जाना कि किसी को ताड़ना क्या होता है। उसकी तरफ़ जाने को कदम बढ़ाए ही थे कि उसके गार्ड ने मुझे रोक लिया। मेरी गार्ड से होती बातचीत देख सुशांत की नज़र मुझ पर पड़ी, तो मैंने इशारे से उसे मिलने के लिए कहा। सुशांत ने गार्ड को इशारा करते हुए कहा, “आने दो उसे।” और मैं लगभग भागते हुए उसके पास जा पहुँची। ऐसा नहीं है कि मैं सुशांत की बहुत बड़ी फैन हूँ, लेकिन उसकी मासूम...

मेरे जीवन की डिक्शनरी में 'जाना' का पर्यायवाची हमेशा 'पीड़ा' लिखा रहेगा। एक अंतहीन यात्रा

ये तस्वीर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी 'लाल टिब्बा' की हैं। पिछले साल लोकडाउन के ठीक पहले पूरे परिवार के साथ गए थे।  मसूरी के सारे स्थानीय जगह घूमने के बाद आखिर में लाल टिब्बा देखने की बारी थी। हमने अपनी प्राइवेट कार से लाल टिब्बा की और चढ़ाई शुरू करी। हालांकि की कई लोग ये चढ़ाई पैदल भी करना पसंद करते है लेकिन क्योंकि हम लोग बहुत थक गए थे तो कार से ही जाना तय किया। हमने मुश्किल से आधा किलोमीटर की ही चढ़ाई की होगी की आगे देखा गाड़ियों का पूरा जाम लगा हुआ था सुनने में आया कि ये जाम 3-4 घंटे तक खुलना नहीं है हमारी गाड़ी के पीछे और भी कई गाड़ियों की कतार लग गयी थी अब ना आगे जाने का रास्ता था ना पीछे। मुझे ढलते सूरज के साथ पहाड़ों की शाम की खूबसूरती को देखना बहुत अच्छा लगता है और ये मैं मिस नहीं करना चाहती थी। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ तो अपना मोबाईल लेकर मैं अकेले ही चल पड़ी। मुझे 4 किलोमीटर की चढ़ाई करनी थी और करीब एक किलोमीटर पार करके मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूं। मैंने साथ मे ना पैसे लिए और ना ही पीने को पानी रास्ते मे बीच मे कही कोई दुकान भी नहीं थी। थोड़ा आग...