Skip to main content

प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं

जब भी कभी मेरे सामने बायो डाटा भरने का सवाल आता हैं जहाँ अक्सर यहीं लिखा या कहा जाता है 'कम शब्दों में अपने जीवन के बारे में बताए' ऐसे में दिमाग शून्य हो जाता है।

समझ नहीं आता ऐसे कम शब्द कहा से लाये जो अभी तक के पूरे जीवन को बयां कर दे।

वो तमाम उतार-चढ़ाव वो संघर्ष वो त्याग वो घुटन भरे दिन, बोझिल सी शामें,किसी अपने को खोने का दर्द ,अपनों के खातिर त्यागी हुई खुशियां,आँखों से ओझल होते सपने,हर कदम पर सहारा बनते पैरेंट्स के कंधे,किसी का निस्वार्थ प्रेम,किसी की नफरत भरी निगाहों से तार-तार हुआ दिल, मन के शमसान में दफनाई हुई उन तमाम ख्वाहिशों को कैसे समेट के रख दे उन चार लाइन वाले कॉलम में ? 

वो फिर भी कहते हैं कि कम शब्दों में बताओ अपने जीवन के बारे में।

तो फिर बतानी पड़ती हैं वो बेबुनियादी दिखावी बातें, वो बड़ी बड़ी डिग्रियां,वो रट्टे मार मार के कमाए नंबर्स और खोखले फ्यूचर प्लान्स।

#प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं

रेखा सुथार

Comments

Popular posts from this blog

मेरे जीवन की डिक्शनरी में 'जाना' का पर्यायवाची हमेशा 'पीड़ा' लिखा रहेगा। एक अंतहीन यात्रा

ये तस्वीर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी 'लाल टिब्बा' की हैं। पिछले साल लोकडाउन के ठीक पहले पूरे परिवार के साथ गए थे।  मसूरी के सारे स्थानीय जगह घूमने के बाद आखिर में लाल टिब्बा देखने की बारी थी। हमने अपनी प्राइवेट कार से लाल टिब्बा की और चढ़ाई शुरू करी। हालांकि की कई लोग ये चढ़ाई पैदल भी करना पसंद करते है लेकिन क्योंकि हम लोग बहुत थक गए थे तो कार से ही जाना तय किया। हमने मुश्किल से आधा किलोमीटर की ही चढ़ाई की होगी की आगे देखा गाड़ियों का पूरा जाम लगा हुआ था सुनने में आया कि ये जाम 3-4 घंटे तक खुलना नहीं है हमारी गाड़ी के पीछे और भी कई गाड़ियों की कतार लग गयी थी अब ना आगे जाने का रास्ता था ना पीछे। मुझे ढलते सूरज के साथ पहाड़ों की शाम की खूबसूरती को देखना बहुत अच्छा लगता है और ये मैं मिस नहीं करना चाहती थी। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ तो अपना मोबाईल लेकर मैं अकेले ही चल पड़ी। मुझे 4 किलोमीटर की चढ़ाई करनी थी और करीब एक किलोमीटर पार करके मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूं। मैंने साथ मे ना पैसे लिए और ना ही पीने को पानी रास्ते मे बीच मे कही कोई दुकान भी नहीं थी। थोड़ा आग...

चाय

Photo: by google तुम चाय बन जाना और मैं शक्कर बन जाउंगी तुम घोल लेना मुझे खुद में मैं पूरा तुममे मिल जाउंगी रेखा

वक़्त

वक़्त जब बेवजह , बेरहम हो जाता है, लबो पर खामोशियों का, पहरा सा होता है, मजबूरियां भी, बिखर जाती है जब आस पास, वजूद जब अपने होने का, सबूत मांगता है, तब कुछ नन्हे से लफ्ज़, दबे पाँव मेरे पास, आ कर मुझसे कहते है,  "ला अपना सारा बोझ कुछ देर को हमको दे दे" रेखा