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प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं

जब भी कभी मेरे सामने बायो डाटा भरने का सवाल आता हैं जहाँ अक्सर यहीं लिखा या कहा जाता है 'कम शब्दों में अपने जीवन के बारे में बताए' ऐसे में दिमाग शून्य हो जाता है।

समझ नहीं आता ऐसे कम शब्द कहा से लाये जो अभी तक के पूरे जीवन को बयां कर दे।

वो तमाम उतार-चढ़ाव वो संघर्ष वो त्याग वो घुटन भरे दिन, बोझिल सी शामें,किसी अपने को खोने का दर्द ,अपनों के खातिर त्यागी हुई खुशियां,आँखों से ओझल होते सपने,हर कदम पर सहारा बनते पैरेंट्स के कंधे,किसी का निस्वार्थ प्रेम,किसी की नफरत भरी निगाहों से तार-तार हुआ दिल, मन के शमसान में दफनाई हुई उन तमाम ख्वाहिशों को कैसे समेट के रख दे उन चार लाइन वाले कॉलम में ? 

वो फिर भी कहते हैं कि कम शब्दों में बताओ अपने जीवन के बारे में।

तो फिर बतानी पड़ती हैं वो बेबुनियादी दिखावी बातें, वो बड़ी बड़ी डिग्रियां,वो रट्टे मार मार के कमाए नंबर्स और खोखले फ्यूचर प्लान्स।

#प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं

रेखा सुथार

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