"अमृता-ईमरोज़"
कहते है दफनाने के बाद सारे रिश्ते चंद दिनों में ख़त्म हो जाते है ।
जिसने भी कहा है झूठ कहा है | उन्हें हम बताएँगे कि जब रिश्ता रुह का रूह से होता है तो जिस्म भले ही राख हो जाए रूहानी रिश्ते ख़ाक नहीं होते |
दुनिया के लिए भले ही तुम नहीं रही, पर मेरे लिए तुम कल भी यहीं थी और आज भी यहीं मौजूद हो |
घर के हरेक हिस्से में तुम्हारी मौजूदगी का अहसास होता है । यहाँ हर कोने में तुम ही तुम बसी हो ।
जब भी नंगे पैर मैं सैर करने निकलता हूँ तो साथ में दो कदमो के टहलने की आहट महसूस करता हूँ और अपने दाहिने हाथ पर हल्का सा दबाव और गर्माहट का अहसास होता है ।
कभी कभी जब मैं अल्हड़पन में स्कूटर लेकर निकल पड़ता हूँ तब तुम्हारी उंगलिया मेरी पीठ पर आज भी "वही" नाम लिखती है और फिर आहिस्ते से तुम्हारे माथे का मेरी पीठ पर सहारा लेकर टिक जाना मुझे आज भी उतना ही सुकून देता है ।
मैं जानता था मेरे नसीब की बारिशें किसी और की छत पर हो रही है, फिर भी तुम्हारे एहसास की वो चंद बूंदें भी मुझे हर लम्हे तरोताजा रखती थी ।
आज भी मैं तुमसे वही बचकानी सी बातें किया करता हूँ और तुम मेरी बातो पर हंसती हुई पहले की तरह ही कहती हो "वे रब भला करे तेरा" और मेरा आज भी वही जवाब होता है "भला तो मेरा कर दिया रब ने तेरी सूरत में आकर" ।
तुमने अपनी आख़िरी नज़्म लिखी थी
"मैं तुझे फिर मिलूंगी", पर तुम मुझसे दूर ही कब गई जो फिर मिलने की बात की? काश कि मैं तुम्हे कभी बता पाता तुम क्या हो मेरे लिए ।
काश ऐसे लफ्ज़ बने होते जो दिल की गहराइयों को बयाँ कर पाते...काश..
तेरे जिस्म की मुझे कभी चाह थी ही नही
और तेरी रूह कभी मुझसे जुदा हुई ही नही ||
रेखा सुथार ~
कहते है दफनाने के बाद सारे रिश्ते चंद दिनों में ख़त्म हो जाते है ।
जिसने भी कहा है झूठ कहा है | उन्हें हम बताएँगे कि जब रिश्ता रुह का रूह से होता है तो जिस्म भले ही राख हो जाए रूहानी रिश्ते ख़ाक नहीं होते |
दुनिया के लिए भले ही तुम नहीं रही, पर मेरे लिए तुम कल भी यहीं थी और आज भी यहीं मौजूद हो |
घर के हरेक हिस्से में तुम्हारी मौजूदगी का अहसास होता है । यहाँ हर कोने में तुम ही तुम बसी हो ।
जब भी नंगे पैर मैं सैर करने निकलता हूँ तो साथ में दो कदमो के टहलने की आहट महसूस करता हूँ और अपने दाहिने हाथ पर हल्का सा दबाव और गर्माहट का अहसास होता है ।
कभी कभी जब मैं अल्हड़पन में स्कूटर लेकर निकल पड़ता हूँ तब तुम्हारी उंगलिया मेरी पीठ पर आज भी "वही" नाम लिखती है और फिर आहिस्ते से तुम्हारे माथे का मेरी पीठ पर सहारा लेकर टिक जाना मुझे आज भी उतना ही सुकून देता है ।
मैं जानता था मेरे नसीब की बारिशें किसी और की छत पर हो रही है, फिर भी तुम्हारे एहसास की वो चंद बूंदें भी मुझे हर लम्हे तरोताजा रखती थी ।
आज भी मैं तुमसे वही बचकानी सी बातें किया करता हूँ और तुम मेरी बातो पर हंसती हुई पहले की तरह ही कहती हो "वे रब भला करे तेरा" और मेरा आज भी वही जवाब होता है "भला तो मेरा कर दिया रब ने तेरी सूरत में आकर" ।
तुमने अपनी आख़िरी नज़्म लिखी थी
"मैं तुझे फिर मिलूंगी", पर तुम मुझसे दूर ही कब गई जो फिर मिलने की बात की? काश कि मैं तुम्हे कभी बता पाता तुम क्या हो मेरे लिए ।
काश ऐसे लफ्ज़ बने होते जो दिल की गहराइयों को बयाँ कर पाते...काश..
तेरे जिस्म की मुझे कभी चाह थी ही नही
और तेरी रूह कभी मुझसे जुदा हुई ही नही ||
रेखा सुथार ~

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