Skip to main content

वो शहर जो कभी रुकता नहीं था

सबकुछ थम सा गया है इस शहर में वो शहर जो कभी रुकने का या थमने का नाम नहीं लेता था जहाँ कभी रात रात सी नही लगती थी जहाँ हर जगह लोगों का मेला लगा रहता था जहाँ कोई भी रुकना नहीं जानता था.. वो शहर आज थम सा गया हैं।

वो  9:55 की फ़ास्ट  लोकल छूट जाने पर 9:56 की स्लो पकड़ने का अफ़सोस अब थोड़े दिन नहीं रहेगा.. हाथ मे पहनी घड़ी भी टीवी के पास पड़ी आराम फरमा रही है.. जिन पड़ौसियों की शकल तक याद नहीं थी आज सब मिलकर एकदूसरे के घर खाने के नए-नए पकवान पूरी साफ-सफाई के साथ अदला-बदली कर रहे है.. नव्वे फ्लोर पर रहने वाले दोस्त से मिले हुए महीने भर से ऊपर हो गया था घर और ऑफिस के बाद कभी खुद के लिए भी तो वक़्त नहीं निकाल पाए थे अब वो पूरे-पूरे दिन साथ मे पत्ते खेलते है गप्पे मरते है बचपन के किस्सों को याद कर एकदूसरे की खूब खिल्ली उड़ा रहे है।
खिड़की पे आने वाले कबूतर को जो हर बार मैं चिढ़ के उड़ा देती थी अब उससे गुटरगूँ करना भी अच्छा लग रहा है।
जाने कबसे सोच रखा था की कभी ऑफिस से जल्दी आयी तो चीज़ कॉर्न बॉल्स पर अपना एक्सपेरिमेंट करूँगी पर ये वक़्त ही तो नहीं मिल पाता था कमबख्त,और अब देखो सबके पास वक्त ही वक़्त है।
जो लोग इस शहर में घर पर सिर्फ रात गुजारने जाते थे वो अब दिनभर बच्चों के साथ बच्चे बने बैठे है,माँ की गोद मे जा कर लेट जाते है किचन में बेहिचक बीवी का हाथ बँटा रहे है घर का काम अपनी बराबर की ज़िम्मेदारी समझ सब एकदूसरे का हाथ बँटा रहे है।

वो जो मशीन बन चुके थे ना.. वो इंसानी भेष में नज़र आ रहे है ।

नौकरी,बिज़नेस, जुआ,एक्टिंग और भी न जाने कितनी चीजों के पीछे भागते-भागते रोबॉट से हो चुके थे कुछ भी महसूस करना भूल ही गए थे बस ये याद था कि पैसे कैसे कमाए जाए कैसे दो के चार बनाये जाए सबकुछ हासिल कर भी लिया था लेकिन उन पैसों से कभी खुद के लिए ज़रा सा सुकूँ नहीं खरीद पाए कभी ।

हर रोज औपचारिकता निभाते निभाते ज़िन्दगी उन्हीं सवालों-जवाबों में उलझ कर रह गयी थी बस..
"कैसे हो "
"क्या हाल"
"और बताओ"
"सब बढ़िया" ?
ये रटे हुए थे कोई मिले तो यही पूछ कर आगे बढ़ जाना है ओर कोई पूछे तो "ठीक हूं" कहकर मुस्करा कर निकल जाना है।
पता नहीं कौनसी उस अनदेखी रेस में भाग रहे थे हम जहाँ हमे ये भी नहीं पता था कि किससे आगे निकलना है और किसको पीछे छोड़ना है हमें तो कंधे पर बैग उठाकर बस भागना था और बस भाग रहे थे..भाग रहे थे, फीलिंग्स, इमोशंस, जज़्बात जैसे शब्द अपने मायने बदल चुके थे।
लेकिन दूर देश से आये एक हवा के झोंके ने ऐसी फूक मारी की सब के सब डर के अपने बिल में घुस गए ।
लेकिन इस डर ने रिश्तों की गाँठों को जो ढीली पड़ चुकी थी उसको और मजबूत बनाया है अपनों को अपनो से करीब लाया है..
वो कहते है ना कि दाग अच्छे है बस वैसे ही ये डर भी अच्छा है ❣️
ऐसा नहीं है कि सबकुछ ऐसा ही थमा रहेगा बस थोड़ा सा और वक़्त और सबकुछ फिर से पहले जैसा हो जाएगा सब फिर अपने-अपने मे व्यस्त हो जाने है बस कोरोना नामक ये काले बादल हट जाए,लेकिन थोड़े पलों के लिए मिले इस ठहराव से कुछ तो भरपाई हुई ही होगी।

रेखा सुथार

Comments

Popular posts from this blog

मेरे जीवन की डिक्शनरी में 'जाना' का पर्यायवाची हमेशा 'पीड़ा' लिखा रहेगा। एक अंतहीन यात्रा

ये तस्वीर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी 'लाल टिब्बा' की हैं। पिछले साल लोकडाउन के ठीक पहले पूरे परिवार के साथ गए थे।  मसूरी के सारे स्थानीय जगह घूमने के बाद आखिर में लाल टिब्बा देखने की बारी थी। हमने अपनी प्राइवेट कार से लाल टिब्बा की और चढ़ाई शुरू करी। हालांकि की कई लोग ये चढ़ाई पैदल भी करना पसंद करते है लेकिन क्योंकि हम लोग बहुत थक गए थे तो कार से ही जाना तय किया। हमने मुश्किल से आधा किलोमीटर की ही चढ़ाई की होगी की आगे देखा गाड़ियों का पूरा जाम लगा हुआ था सुनने में आया कि ये जाम 3-4 घंटे तक खुलना नहीं है हमारी गाड़ी के पीछे और भी कई गाड़ियों की कतार लग गयी थी अब ना आगे जाने का रास्ता था ना पीछे। मुझे ढलते सूरज के साथ पहाड़ों की शाम की खूबसूरती को देखना बहुत अच्छा लगता है और ये मैं मिस नहीं करना चाहती थी। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ तो अपना मोबाईल लेकर मैं अकेले ही चल पड़ी। मुझे 4 किलोमीटर की चढ़ाई करनी थी और करीब एक किलोमीटर पार करके मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूं। मैंने साथ मे ना पैसे लिए और ना ही पीने को पानी रास्ते मे बीच मे कही कोई दुकान भी नहीं थी। थोड़ा आग...

चाय

Photo: by google तुम चाय बन जाना और मैं शक्कर बन जाउंगी तुम घोल लेना मुझे खुद में मैं पूरा तुममे मिल जाउंगी रेखा

वक़्त

वक़्त जब बेवजह , बेरहम हो जाता है, लबो पर खामोशियों का, पहरा सा होता है, मजबूरियां भी, बिखर जाती है जब आस पास, वजूद जब अपने होने का, सबूत मांगता है, तब कुछ नन्हे से लफ्ज़, दबे पाँव मेरे पास, आ कर मुझसे कहते है,  "ला अपना सारा बोझ कुछ देर को हमको दे दे" रेखा