Skip to main content

सुनो लड़की, ये सिर्फ तुम्हारे लिए

 हर कोई तुम्हे अपने नज़रिये से जज करेगा तुम्हारी खूबियों को दरकिनार कर वो लोग तुम्हारी हर कमी को गिनाएंगे तुम्हारे हर ऐब पर उंगली उठाएंगे, मगर तुम इसकी परवाह मत करना अपने अस्तित्व को खूब जीना अपनी कमियों से मायूस न होना वो तुम्हे और बेहतरीन इंसान बनाएगी। बंदिशों को अपनी किस्मत समझ तुम बैठी मत रहना किसी कोने में.. आँगन में बिखरे पंखों को समेट तुम उड़ने की कोशिश जारी रखना नाप लेना आसमान के हर एक कोने को और शाम होते ही लौट आना अपने घोंसले की और की अब तुम्हे पिंजरे और घोंसले में फर्क समझना होगा।

इस ज़िन्दगी के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी तुम्हारा इंतज़ार नहीं करेगी.. लेकिन 'इस' ज़िन्दगी में कई सारी चीजें ऐसी है जो सिर्फ तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। कभी भी लड़की होने की वजह से खुद को कमजोर मत पड़ने देना ये तो इस समाज का एक ढकोसला भर है। यहाँ कोई भी तुम्हारी आज़ादी से खुश नहीं होगा, लेकिन तुम्हे अपनी आजादी खुद चुननी होगी और जिस दिन तुम एक मुकाम पर पहुच जाओगी उसदिन हर कोई तुम तक पहुचने की कोशिश करेगा  इसलिए तुम सिर्फ अपने दिल पर विश्वास करना और अपने होने पर हर पल गर्व महसूस करना होगा।

क्योंकि तुम्हे तुमसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता ❣️

#सेल्फ_मोटिवेशन

Comments

Popular posts from this blog

"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी  का कप हाथ में लिए  याद आ रहे है वो  सर्दी के सुहाने दिन जब  नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय  दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार

"मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं"

~ मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं ना मैं शायर हूँ ना कवि हूँ मैं लिखा जो कभी दिल को छु जाए तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना प्यार लिखती हूँ ना नफरत लिखती हूँ  जो कभी पढ़ लो जज्बात तुम तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना सच लिखती हूँ ना झूठ लिखती हूँ  जो जैसा दीखता है वैसा ही लिखती हूँ दिख जाए जो सादगी लफ़्ज़ों की तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना जख्म लिखती हूँ ना दर्द लिखती हूँ बेजुबां लबो की आवाज लिखती हूँ जो सुन सको तुम भी वो ख़ामोशी  तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं रेखा ~

मुस्कान में अभिनय क्यों है ?

आँसुओ में सच्चाई मुस्कान में अभिनय क्यों है कहते है ज़िंदा है तो ज़िन्दगी से बेज़ार क्यों है लिखा नहीं ज़िन्दगी में साथ जिनका उन्हीं से हर मोड़ पे खुदा मिलवाता क्यों है   बेज़ुबां मूर्तियों के आगे भरे करोडो के भंडारे है उसी की देहलीज पे नन्हे हाथ तरसते क्यों है देखी है मैंने भी शहरो की चमक धमक पर इस रौशनी में चेहरे पहचानने मुश्किल क्यों है कहते है वो ज़माना गया जब मोहोब्बत सच्ची होती थी फिर आज भी सूखे हुए फूल किताबो में मिलते क्यों है.. रेखा सुथार