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Showing posts from 2016

वक़्त

वक़्त जब बेवजह , बेरहम हो जाता है, लबो पर खामोशियों का, पहरा सा होता है, मजबूरियां भी, बिखर जाती है जब आस पास, वजूद जब अपने होने का, सबूत मांगता है, तब कुछ नन्हे से लफ्ज़, दबे पाँव मेरे पास, आ कर मुझसे कहते है,  "ला अपना सारा बोझ कुछ देर को हमको दे दे" रेखा

अधूरी ग़ज़ल

कागज़ पर ख़ामोश बैठी एक अधूरी ग़ज़ल उन रूठे हुए लफ़्ज़ों की राह तक रही है जो ज़रा सी बात पर मुँह मोड़ गए है,वैसे ही जैसे तुम गए थे उस रोज़.. रेखा

उम्मीद

बहुत छोटी सी नन्ही सी है वो मैंने उसे देखा नहीं कभी,पर अक्सर माँ के पास ही मिलती थी मुझे, जब भी घोर अंधेरा छा जाता है , मन मायूस सा हो जाता है हर साँस एक घुटन के साथ निकलती है.. तब पता नहीं कैसे माँ "उसको" मेरे पास भेज देती है और वो आकर मेरे कानों में हौले से कहती है "सब अच्छा होगा" सच में एक "उम्मीद" जीने की कई वजह दे जाती है !! रेखा

माज़ी

मैं अब अक्सर माज़ी की छाँव में बैठ उन पुराने लम्हों में सिगरेट की तरह लम्हा दर लम्हा सुलगता रहता हूँ , बिखर सा गया हूँ उस पुराने कमरे में पड़ी बिखरी चीजों की तरह और सोचता हूँ एक रोज़ तुम लौट आओगी और समेट लोगी मुझे खुद में ~ रेखा सुथार

चाय

Photo: by google तुम चाय बन जाना और मैं शक्कर बन जाउंगी तुम घोल लेना मुझे खुद में मैं पूरा तुममे मिल जाउंगी रेखा