टिप टिप टिप...
बूंदें टपक रही थी,पूरे दो दिनों बाद बारिश ने आज राहत की साँस ली थी ! बारिश के दिनों में नैनीताल का मौसम तालाब से भीग के आये एक नटखट से बच्चे जैसा हो जाता है बिल्कुल। वहाँ ठीक सामने एक बड़ा सा दरिया है जिसमे लिपटा हुआ पूरा शहर जगमगाता हुआ दिखाई पड़ रहा था !
करीब एक बज चूका था मैं अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम कर रही थी,देर तक काम करना अब आदत सी हो गई थी। थोड़ी सी थकान महसूस होने लगी तो अपने लिए चाय उबाल लायी और फिर रोज की तरह हॉल की उस बालकनी में बैठ अपने रेशम के कम्बल में घुस कर अपने दोनों पैरो को खुद में समेटकर बैठ गई और ऊपर टंगे उस तन्हा चाँद के साथ अपनी तन्हाई बाँटने लगी।
ऊपर से जितना चमकीला और खुशनुमा लगता है अंदर से उतना ही उदास और बेजान सा है वो, बिल्कुल मेरे मन की तरह ! चाय की चुस्की के साथ उसकी तरफ एक टक देखे जा रही थी हम दोनों में अक्सर ऐसे ही ख़ामोशी में बातें हुआ करती है शाम होते ही मैं अपने चाय के कप और गरम कम्बल के साथ उसके सामने शिकायतों का पिटारा खोल के बैठ जाती हूँ,कभी अपनी बॉस के सख्त मिजाज़ पर गुस्सा दिखाती हूँ तो कभी अपने कॉलीग द्वारा मुझे बेवजह परेशान करने की शिकायत करती हूँ तो कभी माँ-पापा से एक बार मिला देने की नाकाम कोशिश करती रहती और वो घंटो मेरी बातें सुनता वो भी बिना बोर हुए अब तो इस शहर में वो मेरा सबसे ख़ास दोस्त बन चूका था जिसके साथ मैं मेरा हर लम्हा हर परेशानी सब कुछ उसके साथ बाँटती।
पत्तों से छन कर आती खिड़की के शीशों से कुछ बुँदे रिस रही थीं जो एक एक करके के दम तोड़ रही थी वैसे ही जैसे मेरे अंदर के सारे अहसासों ने दम तोड़ दिया था उस एक हादसे के बाद !
मैं अपनी शिकायतों के और पन्ने खोल ही रही थी के तभी एक तूफ़ान ने वहाँ दस्तक दी ! मेरी और चाँद की गुफ्तगू चल ही रही थी के खिड़की के दूसरे छोर से एक आवाज़ आयी "मुझे भी एक कप चाय मिलेगी क्या" ?
डर के मारे मेरी जान निकल आई थी मेरा चश्मा नाक के निचे आकर अटक गया था और बिना कुछ बोले उसे फ़टी आँखों से एकटक देखे जा रही थी जैसे सच में कोई भूत देख लिया मैंने, तभी मेरी आँखों के सामने दो बार चुटकियाँ बजा कर वो बोला
"ओये ऐसे क्या आँखे फाड़ के देख रही हो इंसान ही हूँ"
मैं वापस अपने होश में आई और झुंझला कर कहा मैंने- "इंसान नही जानवर हो तुम.. मेरे घर में मेरी खिड़की पर क्या कर रहे हो ? हो कौन ? कहाँ से आये हो ? किसी लड़की के घर में ऐसे घुसते हैं ,तमीज़ कहा गई तुम्हारी ? मेरे सवालों की झड़ी चल ही रही थी के उसने मुझे चुप कराते हुए कहा "अरे चुप हो जा बसंती बस एक कप चाय ही तो मांगी है कौन सा तुम्हारी जायदाद में हिस्सा मांग रहा हूँ" ? उसदिन मुझे दूसरी बार इतना गुस्सा आया था "पहली बार खुद पर ही आया था" !
मैंने फिर पुछा उससे "हो कौन और यहाँ क्यों आये हो ? वो बोला "कितना पटर-पटर करती हो तुम थोड़ी साँस ले लो तुम्हारा किडनैप करने आया हूँ डकैती का धंधा है मेरा चलो किडनैप हो जाओ".
मैं एक पल के लिए अपना सूद-बुद खो बैठी थी माथे की रेखाएं सिकुड़ गयी, गुस्से ने अब डर का रूप ले लिया था और यह सोच कर मैं पसीने-पसीने हो गयी के क्या उन लोगो को पता चल गया के मैं कहाँ हूँ ? क्या उन्ही लोगों ने भेजा है इसको ? उन पुराने घावों में फिर से हलचल मच गई थी जो वक़्त की कब्र में सो चुके थे उन घावों के साथ मैं खुद को समेटने ही वाली थी के.. उसने फिर से कहा.. "अरे अरे तुम तो सच में डर गई यार कितनी डरपोक हो तुम और जोर से हँसने लगा ! मैंने कंपकंपाती आवाज़ में उससे पुछा "किसने भेजा है तुम्हें" ?
वह फिर मेरी बात पर हँसा और कहा "अरे बाबा किसी ने नहीं भेजा मुझे मैं इस घर के नीचे वाले फ्लोर पर रहने आया हूँ आज ही,मैं जैसे ही अपने लिये चाय बनाने निकला तो अचानक लाइट चली गई बाहर आकर इधर-उधर देखा तो सबके यहाँ लाइट थी तभी ऊपर देखा तो खिड़की में तुम पर नज़र पड़ी हाथ में कप लिए नाक पर चश्मा चढ़ाए पता नहीं अकेले में क्या बड़बड़ा रही थी, और फिर चाय के लालच में मैं पाइप के सहारे ऊपर आ गया ! "एक कप चाय मुझे भी पिला दो ना" प्लीज !
उसकी बात सुन कर पहले मैंने राहत की साँस ली फिर बोली "एक चाय के लिए तुम पाइप से चढ़ के ऊपर तक आ गये ?" मेरी लड़खड़ाती आवाज़ में अब कड़कपन आ गया था ! "अरे बड़ी खड़ूस लड़की हो तुम,कोई तुम्हारे दरवाजे पे.. "खिड़की पे" उसको बीच में टोकते हुए मैं अकड़ के बोली.. "हाँ वही, खिड़की पर कुछ मांग रहा है और तुम इतना भाव खा रही हो कितनी बेरहम हो तुम एक कप चाय तक नहीं पीला सकती इस चाय के प्यासे को ?
"नोटंकीबाज" ! (मैं बड़बड़ाई)
"क्या कहा तुमने"?
"किसी ड्रामा कंपनी में काम क्यों नहीं करते कितनी अच्छी नौटंकी कर लेते हो"
"तू हिरोइन बनेगी मेरी तो मैं उसमे भी काम करने को तैयार हूँ सोणिये"
उफ़्फ़ कितना दिलफेंक बन्दा है ये.. बदतमीज़ मैं फिर बड़बड़ाई ! फिर वो तपाक से बोला "ओये कोई ऐसा वैसा नहीं हूँ सोम नाम है मेरा खानदानी शरीफ मुंडा हूँ" ! मुझे गुस्सा आ रहा था फिर मैंने सोचा एक चाय की ही तो बात है और इससे बहस करना मतलब दीवार पर अपना सर फोड़ने जैसा होगा और न चाहते हुए भी मैं किचन में तिलमिलाके चाय बनाने चली गई वरना यहीं मेरे सर पे बैठा रहेगा वो चाय का प्यासा ! तभी उसकी आवाज़ आयी "चाय में शक्कर ज्यादा डालना मुझे एक्स्ट्रा मीठी चाय पसंद है"..
नौकर समझ रखा है मुझे, मैने भी शक्कर की जगह जानबुझ कर उसमे एक्स्ट्रा नमक मिला दिया "अब पता चलेगा उसे इसे पीने के बाद ज़िन्दगी में कभी दुबारा चाय का नाम नहीं लेगा"
बाहर आकर मैंने उसे चाय का कप दिया तो वो अंदर आके सोफे वे बैठ गया, मैंने मुंह बना कर पुछा "पार्टी में आये हो" ? ये कप लेकर चलते बनो और हां खिड़की से नहीं उधर दरवाज़ा है " वो कुछ बोला नहीं पर चेहरे को इतना मासूम बना के रखा था के एक घड़ी मेरी नज़रें उसपर टिक कर रह गई पलक झपकते ही देखा वो जा चूका था. उसकी तरफ एक तरह का खीचाव सा महसूस करने लगी.. मैं खिड़की की तरफ दौड़ी वो वहीं खड़ा था मुझे देख कर बोला "थैंक्स फॉर द टी खाड़ूस" मैं कुछ बोलती उससे पहले वो अंदर भाग गया !
मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, ये मुस्कान कुछ अलग थी पता नहीं पर कुछ अजीब से अहसासों की दस्तक हुई थी मन में ! बच्चों की तरह हरकतें थी उसकी बिल्कुल,एक अल्हड़पन था उसकी बातों में... होते है ना कुछ लोग वक़्त के साथ बड़े तो हो जाते है मगर दिल में छुपे उस बच्चे को कभी बड़ा होने ही नहीं देते !
अब ये चाय का सिलसिला अक्सर होने लगा.. मैं जैसे ही अपनी चाय के कप के साथ खिड़की में आ कर बैठती नीचे से उसकी आवाज़ आ जाती है "ओये खड़ूस एक कप चाय नीचे वालो को भी दे दो भला हो जायेगा" .और मैं धीमी सी मुस्कान लिए,जुगाड़ टेक्नोलॉजी से चाय पहुँचा देती और शक्कर की बजाय अब भी नमक ही मिलाया था और फिर शैतानी भरी आवाज़ में उससे पूछती "चाय कैसी बनी" ? और वो हर बार बड़ी सौम्यता से कहता "एकदम मीठी" ! मैं हैरान हो जाती ये सुन कर की "क्या सच में उसको ये नमकीन चाय मीठी लगती है ?।
अब अक्सर खाली वक़्त उसके साथ ही गुज़रता था कभी वो मेरे साथ मॉर्निंग-वॉक पर निकल पड़ता, कभी मेरे साथ सब्जी लेने तो कभी मेरे ऑफिस के बाहर अपनी बाइक के साथ मेरा इंतज़ार करता और कहता "मैं इधर से निकल रहा था तो सोचा तुम्हें भी लेता चलूँ".
बीच में चाट खाने भी रुकते थे पास में एक गार्डन था कभी-कभी वह खेल रहे बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने दौड़ पड़ता और गोल करने पर इतना खुश होता जैसे दुनिया जीत ली हो.. उसके अंदर की उस मासूमियत ने ही मेरा दिल जीता था और उसके दोस्ती का हाथ बढ़ाने पर मेरे दिल ने ज़रा भी संकोच नहीं किया।
यहाँ आये हुए मुझे पूरे तीन साल हो गए थे मगर इन तीन सालों में ना किसी से दोस्ती ना ही किसी से दुश्मनी थी मेरी ! इसके साथ मैं हँसने लगी थी,सच कहूँ तो हँसना सीख रही थी हर बार मेरे सामने उल्टी सीधी हरकतें कर मुझे हँसाता रहता ! हम एक बार वहीं गार्डन में बैठे थे बातों बातों में उसने मुझसे पूछा था "क्या तुम्हे कभी किसी ने बताया कि तुम हँसते हुए बहुत खूबसूरत लगती हो" ? मैंने तब कोई जवाब नही दिया मगर घर आके आईने के सामने देर तक खुद को निहारती रही,उसकी "खूबसूरत" कहने वाली बात बार बार याद आने लगी .. !
ये क्या हो रहा था मुझे? उम्र का ये कैसा अनछुआ पड़ाव था कुछ समझ नही आ रहा था। न चाहते हुए भी दिल बार बार सोम को याद करके गदगद हुआ जा रहा था, और जबसे मेरी ज़िन्दगी में इस सोम के बच्चे ने एंट्री की है तब से अपने ऊपर वाले उस पुराने दोस्त के साथ गुफ्तगू करीब-करीब बंद ही हो गई थी.. ! हमारे बीच चाइना की दीवार बन गया था ये सोम।
मैं अपने में खोयी हुई थी कि तभी मोबाइल पर मेसेज की घंटी बजी.. सोम का ही मेसेज था अब तो मोबाइल में उसका नाम तक देखने से मन खिल उठता, लिखा था "सुनो ! वो जो सामने वाली जोशी आंटी है ना आज बड़ी उदास दिख रही थीं शायद अपने बेटे और पोती को मिस कर रही थीं.. कल उनका जन्मदिन है. मैं चाहता हूँ के उनके लिए कल कुछ स्पेशल करें हम,क्या कहती हो ? अगर जवाब हाँ है तो प्लीज एक कप चाय भेज दो ना अपने नीचे वाले दोस्त के लिए मैं बाहर ही खड़ा हूँ" ! उसका मेसेज पढ़ मैंने मोबाइल को धीरे से अपने माथे पे मारा और हँस पड़ी.. कैसा बुद्धू है ये, मैंने खिड़की से झाँका तो वो ऊपर ही अपनी नज़रे गड़ाये बैठा था. मैंने पुछा "आज भी लाइट नहीं है क्या ? अपने सर को खुजाते हुए उसने कहा "दूध नहीं है" रोज नए बहानों के साथ तैयार रहता है ये ! आज कप को जुगाड़ से अपने फ्लोर से नीचे लटकाने की बजाय मैं दो कप ट्रे में लेकर आज नीचे ही चली गई पता नहीं क्यों पर आज उसके साथ बैठ कर चाय की चुस्कियां लेने का मन कर रहा था। मुझे नीचे आते देख वो ख़ुशी के मारे चौंक गया फिर हम वहीं पास में रखे बैंच पर बैठ गए। हल्की हल्की बुँदें गिर रही थी पहली बार मुझे बारिश की बुँदे मदमस्त कर रही थीं मैं इनको अपनी हथेली में समेटना चाहती थी पर हर कोशिश नाकाम सी रही.. मैं इन बूँदो के साथ खेल ही रही थी के सोम ने मुझसे कुछ पुछा "तुम्हारी आँखों में इतनी उदासी क्यों है माया" ? मैं उसकी बात से झेंप सी गई "उदासी ? कैसी उदासी ? उसने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ा और कहा "माया, क्यों घुँटती हो मन ही मन ? तुम अपने गम अपनी उदासी मुझसे बाँट लो ना !
...........
.......
.......................
.....
मेरा गला भर आया था साँस रुक रुक कर आ रही थी। पहली बार मुझसे यहाँ किसी ने मेरी आँखों मे तैर रही उदासी के बारे में पूछा था। मैं कुछ कहती उससे पहले वो आस्मान की तरफ देखते हुआ बोला "मैं अनाथ हूँ माया ! "उफ़्फ़्फ़ उसकी आवाज़ में कितना दर्द था" मैं एक वृद्धाश्रम में पला बढ़ा हूँ रोज़ी आंटी ने कहा था पैदा होते ही मुझे कोई वहाँ छोड़ गया था और फिर उन लोगों ने ही पाला-पोसा मुझे पर मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब मानता हूँ के मुझे एक नहीं कई सारी माओं का प्यार मिला और जोसेफ अंकल,हरीश अंकल ,मुन्नू दादा सब मुझसे इतना प्यार करते हैं मुझे कभी महसूस ही नहीं होने दिया के मैं अनाथ हूँ,पढ़ाया लिखाया,काबिल बनाया पर ज़िन्दगी में हमेशा एक कमी सी लगी लेकिन पता है माया" तुमसे मिलने के बाद अब वो कमी नहीं खलती मुझे। "यहाँ नैनीताल अपनी कंपनी के काम से मजबूरी में आना पड़ा किसी वजह से बॉस को लंदन जाना पड़ा तो उन्होंने मुझे भेज दिया, शायद ये मेरी किस्मत की मुझे तुमसे मिलाने की साजिश थी" उसकी आँखों में पहली बार मैं नमी देख रही थी..
बूंदें टपक रही थी,पूरे दो दिनों बाद बारिश ने आज राहत की साँस ली थी ! बारिश के दिनों में नैनीताल का मौसम तालाब से भीग के आये एक नटखट से बच्चे जैसा हो जाता है बिल्कुल। वहाँ ठीक सामने एक बड़ा सा दरिया है जिसमे लिपटा हुआ पूरा शहर जगमगाता हुआ दिखाई पड़ रहा था !
करीब एक बज चूका था मैं अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम कर रही थी,देर तक काम करना अब आदत सी हो गई थी। थोड़ी सी थकान महसूस होने लगी तो अपने लिए चाय उबाल लायी और फिर रोज की तरह हॉल की उस बालकनी में बैठ अपने रेशम के कम्बल में घुस कर अपने दोनों पैरो को खुद में समेटकर बैठ गई और ऊपर टंगे उस तन्हा चाँद के साथ अपनी तन्हाई बाँटने लगी।
ऊपर से जितना चमकीला और खुशनुमा लगता है अंदर से उतना ही उदास और बेजान सा है वो, बिल्कुल मेरे मन की तरह ! चाय की चुस्की के साथ उसकी तरफ एक टक देखे जा रही थी हम दोनों में अक्सर ऐसे ही ख़ामोशी में बातें हुआ करती है शाम होते ही मैं अपने चाय के कप और गरम कम्बल के साथ उसके सामने शिकायतों का पिटारा खोल के बैठ जाती हूँ,कभी अपनी बॉस के सख्त मिजाज़ पर गुस्सा दिखाती हूँ तो कभी अपने कॉलीग द्वारा मुझे बेवजह परेशान करने की शिकायत करती हूँ तो कभी माँ-पापा से एक बार मिला देने की नाकाम कोशिश करती रहती और वो घंटो मेरी बातें सुनता वो भी बिना बोर हुए अब तो इस शहर में वो मेरा सबसे ख़ास दोस्त बन चूका था जिसके साथ मैं मेरा हर लम्हा हर परेशानी सब कुछ उसके साथ बाँटती।
पत्तों से छन कर आती खिड़की के शीशों से कुछ बुँदे रिस रही थीं जो एक एक करके के दम तोड़ रही थी वैसे ही जैसे मेरे अंदर के सारे अहसासों ने दम तोड़ दिया था उस एक हादसे के बाद !
मैं अपनी शिकायतों के और पन्ने खोल ही रही थी के तभी एक तूफ़ान ने वहाँ दस्तक दी ! मेरी और चाँद की गुफ्तगू चल ही रही थी के खिड़की के दूसरे छोर से एक आवाज़ आयी "मुझे भी एक कप चाय मिलेगी क्या" ?
डर के मारे मेरी जान निकल आई थी मेरा चश्मा नाक के निचे आकर अटक गया था और बिना कुछ बोले उसे फ़टी आँखों से एकटक देखे जा रही थी जैसे सच में कोई भूत देख लिया मैंने, तभी मेरी आँखों के सामने दो बार चुटकियाँ बजा कर वो बोला
"ओये ऐसे क्या आँखे फाड़ के देख रही हो इंसान ही हूँ"
मैं वापस अपने होश में आई और झुंझला कर कहा मैंने- "इंसान नही जानवर हो तुम.. मेरे घर में मेरी खिड़की पर क्या कर रहे हो ? हो कौन ? कहाँ से आये हो ? किसी लड़की के घर में ऐसे घुसते हैं ,तमीज़ कहा गई तुम्हारी ? मेरे सवालों की झड़ी चल ही रही थी के उसने मुझे चुप कराते हुए कहा "अरे चुप हो जा बसंती बस एक कप चाय ही तो मांगी है कौन सा तुम्हारी जायदाद में हिस्सा मांग रहा हूँ" ? उसदिन मुझे दूसरी बार इतना गुस्सा आया था "पहली बार खुद पर ही आया था" !
मैंने फिर पुछा उससे "हो कौन और यहाँ क्यों आये हो ? वो बोला "कितना पटर-पटर करती हो तुम थोड़ी साँस ले लो तुम्हारा किडनैप करने आया हूँ डकैती का धंधा है मेरा चलो किडनैप हो जाओ".
मैं एक पल के लिए अपना सूद-बुद खो बैठी थी माथे की रेखाएं सिकुड़ गयी, गुस्से ने अब डर का रूप ले लिया था और यह सोच कर मैं पसीने-पसीने हो गयी के क्या उन लोगो को पता चल गया के मैं कहाँ हूँ ? क्या उन्ही लोगों ने भेजा है इसको ? उन पुराने घावों में फिर से हलचल मच गई थी जो वक़्त की कब्र में सो चुके थे उन घावों के साथ मैं खुद को समेटने ही वाली थी के.. उसने फिर से कहा.. "अरे अरे तुम तो सच में डर गई यार कितनी डरपोक हो तुम और जोर से हँसने लगा ! मैंने कंपकंपाती आवाज़ में उससे पुछा "किसने भेजा है तुम्हें" ?
वह फिर मेरी बात पर हँसा और कहा "अरे बाबा किसी ने नहीं भेजा मुझे मैं इस घर के नीचे वाले फ्लोर पर रहने आया हूँ आज ही,मैं जैसे ही अपने लिये चाय बनाने निकला तो अचानक लाइट चली गई बाहर आकर इधर-उधर देखा तो सबके यहाँ लाइट थी तभी ऊपर देखा तो खिड़की में तुम पर नज़र पड़ी हाथ में कप लिए नाक पर चश्मा चढ़ाए पता नहीं अकेले में क्या बड़बड़ा रही थी, और फिर चाय के लालच में मैं पाइप के सहारे ऊपर आ गया ! "एक कप चाय मुझे भी पिला दो ना" प्लीज !
उसकी बात सुन कर पहले मैंने राहत की साँस ली फिर बोली "एक चाय के लिए तुम पाइप से चढ़ के ऊपर तक आ गये ?" मेरी लड़खड़ाती आवाज़ में अब कड़कपन आ गया था ! "अरे बड़ी खड़ूस लड़की हो तुम,कोई तुम्हारे दरवाजे पे.. "खिड़की पे" उसको बीच में टोकते हुए मैं अकड़ के बोली.. "हाँ वही, खिड़की पर कुछ मांग रहा है और तुम इतना भाव खा रही हो कितनी बेरहम हो तुम एक कप चाय तक नहीं पीला सकती इस चाय के प्यासे को ?
"नोटंकीबाज" ! (मैं बड़बड़ाई)
"क्या कहा तुमने"?
"किसी ड्रामा कंपनी में काम क्यों नहीं करते कितनी अच्छी नौटंकी कर लेते हो"
"तू हिरोइन बनेगी मेरी तो मैं उसमे भी काम करने को तैयार हूँ सोणिये"
उफ़्फ़ कितना दिलफेंक बन्दा है ये.. बदतमीज़ मैं फिर बड़बड़ाई ! फिर वो तपाक से बोला "ओये कोई ऐसा वैसा नहीं हूँ सोम नाम है मेरा खानदानी शरीफ मुंडा हूँ" ! मुझे गुस्सा आ रहा था फिर मैंने सोचा एक चाय की ही तो बात है और इससे बहस करना मतलब दीवार पर अपना सर फोड़ने जैसा होगा और न चाहते हुए भी मैं किचन में तिलमिलाके चाय बनाने चली गई वरना यहीं मेरे सर पे बैठा रहेगा वो चाय का प्यासा ! तभी उसकी आवाज़ आयी "चाय में शक्कर ज्यादा डालना मुझे एक्स्ट्रा मीठी चाय पसंद है"..
नौकर समझ रखा है मुझे, मैने भी शक्कर की जगह जानबुझ कर उसमे एक्स्ट्रा नमक मिला दिया "अब पता चलेगा उसे इसे पीने के बाद ज़िन्दगी में कभी दुबारा चाय का नाम नहीं लेगा"
बाहर आकर मैंने उसे चाय का कप दिया तो वो अंदर आके सोफे वे बैठ गया, मैंने मुंह बना कर पुछा "पार्टी में आये हो" ? ये कप लेकर चलते बनो और हां खिड़की से नहीं उधर दरवाज़ा है " वो कुछ बोला नहीं पर चेहरे को इतना मासूम बना के रखा था के एक घड़ी मेरी नज़रें उसपर टिक कर रह गई पलक झपकते ही देखा वो जा चूका था. उसकी तरफ एक तरह का खीचाव सा महसूस करने लगी.. मैं खिड़की की तरफ दौड़ी वो वहीं खड़ा था मुझे देख कर बोला "थैंक्स फॉर द टी खाड़ूस" मैं कुछ बोलती उससे पहले वो अंदर भाग गया !
मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, ये मुस्कान कुछ अलग थी पता नहीं पर कुछ अजीब से अहसासों की दस्तक हुई थी मन में ! बच्चों की तरह हरकतें थी उसकी बिल्कुल,एक अल्हड़पन था उसकी बातों में... होते है ना कुछ लोग वक़्त के साथ बड़े तो हो जाते है मगर दिल में छुपे उस बच्चे को कभी बड़ा होने ही नहीं देते !
अब ये चाय का सिलसिला अक्सर होने लगा.. मैं जैसे ही अपनी चाय के कप के साथ खिड़की में आ कर बैठती नीचे से उसकी आवाज़ आ जाती है "ओये खड़ूस एक कप चाय नीचे वालो को भी दे दो भला हो जायेगा" .और मैं धीमी सी मुस्कान लिए,जुगाड़ टेक्नोलॉजी से चाय पहुँचा देती और शक्कर की बजाय अब भी नमक ही मिलाया था और फिर शैतानी भरी आवाज़ में उससे पूछती "चाय कैसी बनी" ? और वो हर बार बड़ी सौम्यता से कहता "एकदम मीठी" ! मैं हैरान हो जाती ये सुन कर की "क्या सच में उसको ये नमकीन चाय मीठी लगती है ?।
अब अक्सर खाली वक़्त उसके साथ ही गुज़रता था कभी वो मेरे साथ मॉर्निंग-वॉक पर निकल पड़ता, कभी मेरे साथ सब्जी लेने तो कभी मेरे ऑफिस के बाहर अपनी बाइक के साथ मेरा इंतज़ार करता और कहता "मैं इधर से निकल रहा था तो सोचा तुम्हें भी लेता चलूँ".
बीच में चाट खाने भी रुकते थे पास में एक गार्डन था कभी-कभी वह खेल रहे बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने दौड़ पड़ता और गोल करने पर इतना खुश होता जैसे दुनिया जीत ली हो.. उसके अंदर की उस मासूमियत ने ही मेरा दिल जीता था और उसके दोस्ती का हाथ बढ़ाने पर मेरे दिल ने ज़रा भी संकोच नहीं किया।
यहाँ आये हुए मुझे पूरे तीन साल हो गए थे मगर इन तीन सालों में ना किसी से दोस्ती ना ही किसी से दुश्मनी थी मेरी ! इसके साथ मैं हँसने लगी थी,सच कहूँ तो हँसना सीख रही थी हर बार मेरे सामने उल्टी सीधी हरकतें कर मुझे हँसाता रहता ! हम एक बार वहीं गार्डन में बैठे थे बातों बातों में उसने मुझसे पूछा था "क्या तुम्हे कभी किसी ने बताया कि तुम हँसते हुए बहुत खूबसूरत लगती हो" ? मैंने तब कोई जवाब नही दिया मगर घर आके आईने के सामने देर तक खुद को निहारती रही,उसकी "खूबसूरत" कहने वाली बात बार बार याद आने लगी .. !
ये क्या हो रहा था मुझे? उम्र का ये कैसा अनछुआ पड़ाव था कुछ समझ नही आ रहा था। न चाहते हुए भी दिल बार बार सोम को याद करके गदगद हुआ जा रहा था, और जबसे मेरी ज़िन्दगी में इस सोम के बच्चे ने एंट्री की है तब से अपने ऊपर वाले उस पुराने दोस्त के साथ गुफ्तगू करीब-करीब बंद ही हो गई थी.. ! हमारे बीच चाइना की दीवार बन गया था ये सोम।
मैं अपने में खोयी हुई थी कि तभी मोबाइल पर मेसेज की घंटी बजी.. सोम का ही मेसेज था अब तो मोबाइल में उसका नाम तक देखने से मन खिल उठता, लिखा था "सुनो ! वो जो सामने वाली जोशी आंटी है ना आज बड़ी उदास दिख रही थीं शायद अपने बेटे और पोती को मिस कर रही थीं.. कल उनका जन्मदिन है. मैं चाहता हूँ के उनके लिए कल कुछ स्पेशल करें हम,क्या कहती हो ? अगर जवाब हाँ है तो प्लीज एक कप चाय भेज दो ना अपने नीचे वाले दोस्त के लिए मैं बाहर ही खड़ा हूँ" ! उसका मेसेज पढ़ मैंने मोबाइल को धीरे से अपने माथे पे मारा और हँस पड़ी.. कैसा बुद्धू है ये, मैंने खिड़की से झाँका तो वो ऊपर ही अपनी नज़रे गड़ाये बैठा था. मैंने पुछा "आज भी लाइट नहीं है क्या ? अपने सर को खुजाते हुए उसने कहा "दूध नहीं है" रोज नए बहानों के साथ तैयार रहता है ये ! आज कप को जुगाड़ से अपने फ्लोर से नीचे लटकाने की बजाय मैं दो कप ट्रे में लेकर आज नीचे ही चली गई पता नहीं क्यों पर आज उसके साथ बैठ कर चाय की चुस्कियां लेने का मन कर रहा था। मुझे नीचे आते देख वो ख़ुशी के मारे चौंक गया फिर हम वहीं पास में रखे बैंच पर बैठ गए। हल्की हल्की बुँदें गिर रही थी पहली बार मुझे बारिश की बुँदे मदमस्त कर रही थीं मैं इनको अपनी हथेली में समेटना चाहती थी पर हर कोशिश नाकाम सी रही.. मैं इन बूँदो के साथ खेल ही रही थी के सोम ने मुझसे कुछ पुछा "तुम्हारी आँखों में इतनी उदासी क्यों है माया" ? मैं उसकी बात से झेंप सी गई "उदासी ? कैसी उदासी ? उसने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ा और कहा "माया, क्यों घुँटती हो मन ही मन ? तुम अपने गम अपनी उदासी मुझसे बाँट लो ना !
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मेरा गला भर आया था साँस रुक रुक कर आ रही थी। पहली बार मुझसे यहाँ किसी ने मेरी आँखों मे तैर रही उदासी के बारे में पूछा था। मैं कुछ कहती उससे पहले वो आस्मान की तरफ देखते हुआ बोला "मैं अनाथ हूँ माया ! "उफ़्फ़्फ़ उसकी आवाज़ में कितना दर्द था" मैं एक वृद्धाश्रम में पला बढ़ा हूँ रोज़ी आंटी ने कहा था पैदा होते ही मुझे कोई वहाँ छोड़ गया था और फिर उन लोगों ने ही पाला-पोसा मुझे पर मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब मानता हूँ के मुझे एक नहीं कई सारी माओं का प्यार मिला और जोसेफ अंकल,हरीश अंकल ,मुन्नू दादा सब मुझसे इतना प्यार करते हैं मुझे कभी महसूस ही नहीं होने दिया के मैं अनाथ हूँ,पढ़ाया लिखाया,काबिल बनाया पर ज़िन्दगी में हमेशा एक कमी सी लगी लेकिन पता है माया" तुमसे मिलने के बाद अब वो कमी नहीं खलती मुझे। "यहाँ नैनीताल अपनी कंपनी के काम से मजबूरी में आना पड़ा किसी वजह से बॉस को लंदन जाना पड़ा तो उन्होंने मुझे भेज दिया, शायद ये मेरी किस्मत की मुझे तुमसे मिलाने की साजिश थी" उसकी आँखों में पहली बार मैं नमी देख रही थी..
उसकी आँखों से एक बूंद मेरी हथेली पे आ गिरी जो उसने कस के पकड़ रखी थी !
मैं हैरान थी उसकी बातें सुन कर, वो ज़िद्दी आवारा पागल लड़का जो दिनभर मेरे आस-पास मंडराता रहता जोशी आंटी के साथ फ़्लर्ट करता और उन्हें अपनी गर्लफ्रेंड बुलाता, यहाँ आये हुए उसे एक महीना भी नहीं हुआ था और पूरी सोसाइटी पर अपना जादू बिखेर दिया था. बेख़ौफ़ उन्मुक्त उड़ान भरने वाला सोम, मैं तो उसे एक सामान्य घर का बच्चा समझ रही थी जो घरवालों से दूर यहाँ नैनीताल में छुट्टियां बीताने आया है" मैं उसकी तरफ देख रही थी मेरे हाथ खुद ही उसके गालो को स्पर्श करने आगे बढ़ गए और उसने फटाक से अपने आँसू पोंछे और मुझसे दूबारा पूछा "बताओ ना माया क्या है तुम्हारी उदासी की वजह".
मेरे पास ना बताने की कोई वजह नही थी,और मैं लौट पड़ी फिर से अतीत के उस काले जंगल में सोम को लेकर.
"कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा कर दादी और तायाजी ने अपना कर्जा उतारने और पैसों की लालच में मेरी शादी इंसान के भेस में राक्षस के साथ करने का फैसला कर दिया ! माँ-पापा बहुत ज्यादा याद आये उसदिन, मैं सुबक रही थी और जोर जोर से चिल्ला रही थी "क्यों छोड़ के चले गए आप मुझे,मुझे भी क्यों नहीं ले गए उसदिन कार में अपने साथ ?" और रोते-रोते न जाने कब आँख लग गई,सुबह बाहर जा के देखा तो सब शादी की तैयारी में लगे हुए थे,मेरा दिल बैठ गया था धड़कनें जोरों से चल रही थी पूरा शरीर सुन्न हो गया.. सारे ख्वाब,सारी ख्वाहिशें मेरे सामने एक एक कर के दम तोड़ रही थी। गला रुंध सा गया था मगर कोई ऐसा कंधा नहीं था जिस पे सर रख के दो पल मैं रो भी सकु ! दादी में हमेशा माँ को खोजती रही कि शायद कभी उनका कठोर दिल पिघल जाए और मुझे एक बार अपनी गोदी में सुला कर कहे "तू चिंता मत कर मैं हूँ न तेरे पास." मगर इसकी बजाय हमेशा कड़वी बातें बेरहम ताने और उपहास ही मिला.. खैर अब इन सबकी आदत हो गई थी मुझे मगर अब ये ज़िन्दगी ऐसा दिन भी दिखाएँगी,यह कभी सोचा नहीं था !
उसदिन कुछ पल मैंने अपने शरीर को आग की लपटों के हवाले कर दिया जिसमे सारे सपनें सारे अरमान जल के स्वाहा हो गए। आग की कुछ लपटें मेरे अंतर्मन में भी थीं जो अंदर से मुझे पूरा खाख कर चुकी थी !
न चाहते हुए भी मुझे इस अनचाहे रिश्ते में अपने आप को झोंकना पड़ा, रात हो चुकी थी मुझे एक कमरे में बिठाया गया था हाथ भर घूँघट निकाल कर.. सुबह मुरझाये कुचले फूलों की तरह मैं भी बिस्तर के एक कोने में मुरझाई सी पड़ी थी ! ज़िन्दगी नरक से भी बद्तर हो गई थी मेरा वजूद मुझसे छिन सा जा रहा था मेरी ज़िन्दगी रसोई और बिस्तर के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी और कभी ज़रा सी गलती पर कमरे से तमाचों की गूंज भी आती। मेरे अंदर की ख़ामोशी चीखती-चिल्लाती मगर उस चारदीवारी में वो आवाज़ें लौट कर मेरी ही तरफ आतीं !
आज निमि की बहुत याद आ रही थी मेरी बचपन की दोस्त एक वही थी जिसने हर कदम पर मुझे हौसला दिया,हमेशा मेरा साथ दिया .कई बार दादी और तायाजी के बेवजह गुस्से से भी बचाती रही, और उसदिन एक करिश्मा हुआ अचानक बाहर से किसी ने आवाज़ दी "अरे बहुरानी, तुमसे कोई मिलने आया है" ।
बाहर आ के देखा तो अपनी आँखों पर यकीन नही हुआ मेरे सामने निमि खड़ी थी और मैं दौड़ के उसके पास गई और उसे कस के गले लगा लिया और आँखों से जैसे समंदर उमड़ पड़ा उसे अपने कमरे में ले आयी वो चुप थी और मेरी तरफ हैरानी से देख रही थी उसकी प्रश्न करती नज़रो ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था, ख़ामोशी तोड़ते हुए उसने पुछा "क्यों अपने ही हाथों से अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर रही हो ? " मैं अपने अंदर के तूफ़ान रोक नहीं पायी और उसकी गोदी में सर टिका के जोर जोर से रोने लगी वैसे ही जैसे एक छोटा बच्चा चोट लगने पर माँ की गोद मिलते ही सुबक सुबक के रो देता है ! दो पल उसके पास बीताने पर लगा के शायद माँ भी ऐसी ही होती होगी ! मेरे सर पर हाथ फेर रही थी और बोली रो ले खुल के क्योंकि इसके बाद मैं तेरी आँखों में कभी आँसू नहीं आने दूंगी" मेरे आंसू पोछ कर मुझे कहा "माया तुम निकल जाओ इस दलदल से वरना या तो घूंट-घूंट कर मर जाओगी या एक दिन तंग आ कर खुदखुशी कर लोगी इससे पहले के ऐसा कुछ हो तुम निकल जाओ यहाँ से" ! उसके हर लफ्ज़ में मुझे मजबूती का अहसास हो रहा था मगर अपने अंदर के उस गैरज़रूरी डर को मैं भगा नही पायी थी ! इससे पहले कि मैं अपने डर और मजबूरियों का पोटला उसके सामने खोलती उसने कहा "माया,अपने लिए नहीं मगर उन तमाम सपनों की खातिर मेरी बात मान ले दोस्त थोड़ी हिम्मत कर ले ! बाहर एक नई दुनिया बाहें फैलाए तेरा इंतज़ार कर रही है "आज नहीं तो कभी नहीं" ! उसकी ये बातें सुनकर मेरी मजबूरी ने अब मजबूती का रूप ले लिया था निमि की बातों में उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी मुझे, और मैंने उससे पुछा "पर जाउंगी कहाँ और कैसे" ? ये बहुत ही खतरनाक लोग हैं इस बारे में ज़रा भी इन्हें भनक लगी तो मेरे साथ तुम्हे भी ...
किसी को कुछ पता नहीं चलेगा तुम बस जैसा मैं कहती हूँ वैसा करो और मत सोचना कभी यहाँ के लोगों के बारे में जिन्होंने कभी तुम्हे अपना माना ही नहीं जिनके लिए तुम केवल फायदे और नुकसान की एक किश्त भर हो। बस तू इन सबकी परवाह मत कर और चली जा.. चली जा.. !
और मैं निमि की मदद से यहाँ आ गयी।
कहते हुए मैं फूट फूट कर रो पड़ी।
और सोम ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया जैसे किसी डरे हुए बच्चे को एक पिता अपनी बाहों में समेटकर उसे हौसला देता है कि "मैं हूँ ना" ! पहली बार उसने मुझे इस तरह से छुआ था। उसकी छुअन मेरे पूरे बदन पर एक सिरहन सी पैदा कर रही थी ! कुछ देर हम ऐसे ही रहे हम दोनों को एक दूसरे की धड़कन साफ साफ सुनाई दे रही थी।
काश ये पल यहीं ठहर जाता !
सोम की बाहों में खुद को इतना महफूज़ पा रही थी के मन से अतीत की काली दीवारों का मैला पानी लगभग बह गया था, कितना सुकून था उसकी बाहों में ! मुझे अपनी बाहों में लेकर विश्वास भरी आवाज़ में उसने कहा था "माया, तुम्हारी माँ ज़रूर एक प्यारी और हिम्मत वाली स्त्री रही होंगी जिन्होंने हमें इतनी प्यारी माया दी" और ऊपर देखकर वो बोला "थेंक यू आंटी"
बातों-बातों में ध्यान ही नहीं गया कि हम दोनों एक ही कप से बारी-बारी चुस्कियाँ ले रहे थे और उसके कप की वो नमकीन चाय सच मे मीठी लग रही थी।
उस रात दो अधूरे धागों ने एक मुकम्मल ख्वाब बूना था जो ज़िन्दगी के तमाम ठिठुरते मौसमों से बचाने को काफी था।
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रेखा सुथार

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