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सीखना ज़रूरी था


हम में से कुछ लोगों की एक आदत बन चुकी हैं कि जब भी हम बस में,ट्रैन में,टैक्सी में या ऑटो में सफर करते वक़्त अगर पास में कुछ कचरा या स्नैक्स खाने के बाद वो पॉलीथिन को हम विंडो से बाहर फेंक देते हैं।
लोकल में भी कई बार ऐसा कोई न कोई करता मिल ही जाता हैं..
आज फिर मेरे बगल में बैठी आंटी ने अपने बच्चे को कुछ खिलाने के बाद उस पेपर को रैप करके ट्रैन की जालीनुमा खिड़की से बाहर फेंकने लगी तो मैंने मुस्कराकर उनसे धीरे से कहा कि  'आंटी,डस्टबिन में फेंक देना ना' ..
वो कुछ नहीं बोली,और उस रैपर को अपने हाथ मे ही रख लिया।
मुझे अगले स्टेशन पर ही उतरना था तो मैंने कहा लाओ मुझे दे दो मैं डाल दूंगी।
मुझे नहीं पता उन्होंने क्या सोचा होगा, ऐसा भी नहीं कि वो सफाई के प्रति सजग नहीं होगी,बेशक वो अपने घर और आसपास को स्वच्छ रखती होगी।
पर ये फेंकने की बात हैं वो कही न कही हमारी आदतों में शुमार हो गयी हैं जो कि काफी हद तक ख़तम भी हुई हैं।
मैंने भी पहले कई बार आसपास की नज़रों से बच-बचाके कई रैपर बस की विंडो से बाहर फेंके हैं ऐसे ही एक दिन सबसे नज़रें चुराकर चिप्स का खाली पैकेट फेंकने ही वाली थी कि पीछे से एक अंकल ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराकर इशारे से वो खाली पैकेट मुझसे मांग लिया और मुझसे बिना कुछ कहे बस से उतर गए..
मैंने खिड़की से झांक कर देखा था उन्होंने वो पैकेट वहा पड़े डस्टबिन में डाल दिया था।
बस उसदिन के बाद से मैंने कभी ऐसा नहीं किया और जिसको भी ऐसा करते देखती हूँ तो बिना कुछ कहे उनसे वो कचरा लेकर जहाँ भी डस्टबिन मिले उसमें डाल देती हूं।
उसदिन उन अंकल ने मुझे बिना कुछ कहे बहुत कुछ समझा दिया था।
Rekha Suthar
#किस्से_लोकल_के





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