वो लेडिस डब्बे में मेरे बगल में बैठी थी।
मैं रोज की तरह इयरफोन लगा के अपनी फिक्स विंडो सीट पर बैठी थी। कानों में खानुम आपा बार बार कह रही थी "आज जाने की ज़िद ना करो".. (उनकी आवाज़ में जो कसक जो खनक है वो शायद ही कभी किसी और आवाज़ में महसूस हुई हो)।
हर स्टेशन पर वहा खड़े लोगों की एक्टिविटी को ऑब्ज़र्व करना मेरा रोज का काम हैं। मैं अपने मे ही गुम थी कि तभी मैंने महसूस किया कि मेरे ठीक बगल में बैठी एक बुजुर्ग महिला मुझे कुछ कहना चाह रही है जब मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे बुलाया तो मैंने कानों से ईयरफोन निकाल उनसे माफ़ी मांगते हुए मैंने कहा- "बोलिये ना आंटी क्या हुआ" ?
वो करीब अंदाजन साठ साल की एक एक्टिव लेडी लग रही थी।
वो बोली "बेटा सांताक्रुज कब आएगा" ?
मैंने कहा "आंटी अभी से चार स्टेशन बाद आएगा"
मुझे थोड़ा अजीब लगा उनका ये सवाल क्योंकि दिखने में कोई नौकरीपेशा लग रही थी, पर फिर सोचा हो सकता है ये पहली बार सफर कर रही हो लोकल में।
और मैं फिर से खिड़की की तरफ पलट गयी मैंने दो मिनट बाद उनकी तरफ देखा तो वो काफी परेशान दिख रही थी तो मैंने पूछा "आंटी कोई परेशानी हैं क्या ? आपको कहा जाना हैं सांताक्रूज में ?
इसपर उन्होंने मुझे पूछा कि ये सांताक्रूज कहा है ?
उनके इस सवाल से मुझे लगा कुछ गड़बड़ हैं। मैंने फिर पूछा कि सांताक्रूज में आपको कहा जाना हैं ? वो एकदम परेशान होके बोली "पता नहीं"।
थोड़ी सी डर गई मैं कुछ देर तो कुछ समझ नहीं आया कि क्या करूँ फिर मैं उन्हें लेकर सांताक्रूज स्टेशन पर उतर गई। पहले मैंने सोचा पुलिस को इन्फॉर्म कर देती हूँ लेकिन रुक गयी (पता नहीं क्यों)।
मैं उनसे बार-बार पूछ रही थी कि आपके पास किसी का नम्बर हो या घर का पता हो तो बताइए मैं आपको छोड़ देती हूँ पर उन्हें कुछ नहीं पता था। हम दोनों वही एक बैंच पर जा के बैठे मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या करूँ तभी उनके हैंडबैग से वाइब्रेशन महसूस किया मैंने तो तुरंत पूछा आंटी आपके पास फोन है क्या ? वो बोली पता नहीं मैंने उनका बैग चैक किया तो देखा उनका फोन वाइब्रेंट हो रहा था मैंने बिना देरी के उसे उठा लिया।
सामने से एक लड़की की आवाज़ आयी "हैल्लो मोम.. मोम.. आप कहा हो" ?
मैंने जवाब दिया "वो यहाँ सांताक्रूज में हैं"
लड़की ने कहा "आप प्लीज़ वही उनके साथ रहिएगा मैं बस 10-20मिनट में वहा पहुच रही हूँ"
मैंने कहा ठीक है।
मैं अभी तक कुछ नहीं समझ पा रही थी और मन में घबराहट सी हो रही थी।
फोन पर कोऑर्डिनेट करके वो लड़की हम तक पहुच गयी साथ मे एक आदमी भी था शायद उसका पति होगा। लड़की ने आते ही अपनी माँ को गले लगाया और रो दी।
अब मेरे दिमाग मे सवाल और बढ़ते गए आखिर ये मिस्ट्री है क्या ?
तब उनकी बेटी मेरे पास आई और मुझे थैंक यू कहा और इससे पहले की मैं कुछ पूछती वो बोली
"मेरी मोम एक स्कूल टीचर हैं और वो पिछले तीस सालों से टीचिंग करा रही हैं उन्हें बच्चों से और टीचिंग से इतना ज्यादा प्यार है कि उन्होंने रिटायरमेंट के बाद भी वहा पढ़ाना जारी रखा। पिछले तीस सालों से रोज स्कूल जाना उनके लिए ऑक्सीजन लेने की तरह था और इस दौरान शायद ही कोई मौका रहा हो कि इन्होंने छुट्टी ली हो।
लेकिन पिछले एक साल से मोम अल्जाइमर की शिकार होने लगी और अब धीरे-धीरे ये सबकुछ भूलने लगी हैं सिवाय एक चीज़ के वो ये की "रोज़ सुबह जल्दी उठकर तैयार होना और स्कूल के लिए निकलना" ये सबकुछ भूल गयी हैं यहाँ तक कि हमलोगों को भी भूल जाती हैं लेकिन स्कूल जाना नहीं। पिछले एक साल से हम में से कोई न कोई मोम के पास रहता ही हैं लेकिन आज पता नहीं कैसे ये बाहर चली गयी बट थैंक गॉड आप साथ रहे इनके और फ़ोन उठा लिया कहते हुए मेरे गले लग गयी वो।
और वो चले गए जाते हुए आंटी हल्की से मुस्कान लिए मेरे गालों को सहलाकर गयी मैंने भी उन्हें हल्की सी स्माइल दी।
मैं कुछ देर तक वही बैठी रही ये घटना बहुत छोटी थी मगर मन में कही घर कर गई थी।
ये जीवन का कैसा पड़ाव होता है कि यहाँ आकर आप अपनी जी हुई तमाम ज़िन्दगी को एक ही पल में भूल जाते हैं,मतलब सबकुछ ब्लेंक हो जाता है ?
क्या ऊपरवाला हमारी ज़िंदगी पेंसिल से लिखता हैं जिससे की वो जब मन करे इरेज कर देता है और हमे वापस उसी दौर में लाकर खड़ा कर देता है जहाँ से इस दुनिया को समझना शुरू किया था।
तो कोई ऊपरवाले से कह देना इश्क़ भुलाए नहीं भूलता.. वो दिमाग से यादें मिटा सकता हैं मगर इश्क़... इश्क़ तो रगों में बहता हैं खून की तरह।
जैसे उन आंटी की रगों में बह रहा था उनकी टीचिंग के लिए प्यार।
इश्क़ चाहे अपने काम से हो या किसी इंसान से वो किसी अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी का मोहताज नहीं होता।
इश्क आत्मा से होता हैं शरीर से नहीं ।
और आंटी इसका परफेक्ट एग्जाम्पल थी ❣️
मैंने #अल्ज़ाइमर पर एक प्रेम कहानी लिखी थी "उसने कहा था" वो बस कहानी थी.. लेकिन ये कहानी नहीं है।
#किस्से_लोकल_के
#स्कूल_टीचर ❣️
#इश्क़
#अल्ज़ाइमर
© Rekha Suthar

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