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भीड़ भरा जेंट्स डिब्बा



कुछ दिन पहले की बात हैं, शाम को करीब 5-6 बजे अंधेरी से लोकल पकड़नी थी, यहाँ मुम्बई में सारी सवारी एक तरफ और लोकल की सवारी एक तरफ कोई मुकाबला ही नहीं है लोकल का हर मायने में.. वैसे तो इसके बहुत सारे फायदे हैं तो वही कुछ नुकसान भी हैं।
तो मैं लोकल पकड़ने के लिए खड़ी थी कुछ देर बाद ट्रेन आ गयी इतनी भयंकर भीड़ देखकर एक बार तो चढ़ने की कोशिश की पर मजाल की वो औरतें मेरी कोशिश को कामयाब होने देती और कड़ी मशक्कत के बाद भी नही चढ़ पायी। कुछ ही सेकेंड में ट्रेन निकल पड़ी उस दौरान आप चढ़ गए तो चढ़ गए रह गए तो रह गए।
ट्रैन चली ही थी कि तभी लेडीज़ डब्बे से अचानक एक लड़की गिर पड़ी जो कि मेरे सामने ही चढ़ चुकी थी,अगर उस पोलिस वाली मोहतरमा ने तुरंत हाथ पकड़ के नहीं खींचा होता तो..... बस बाल-बाल बची
उसने बताया कि वो तो दरवाजे से अंदर की तरफ जा चुकी थी पर दो औरतों ने उसे जोर से धक्का दिया और वो संभल नहीं पायी.. अब क्या टिप्पणी करू इसपर।
वैसे मुझे रोज खाली लोकल ही मिलती हैं आते-जाते दोनो वक़्त पर उसदिन दूसरा रूट था।
खैर, तभी दूसरी लोकल आ चुकी थी और डर के मारे मैं लेडीज़ कंपार्टमेंट में चढ़ने की बजाय जेंट्स कंपार्टमेंट में चढ़ गई वहा भी उतनी की उतनी भीड़ थी। मन मे सोचा कि चढ़ तो गयी हूँ पर गलती तो नहीं कि दस मिनट बाद मेरा स्टेशन आने वाला था और मुझे दूसरी तरफ से उतारना था जहाँ जाने के लिए मुझे एक भीड़ से गुजरना होगा। मैं बता नहीं सकती कितना बड़ा टास्क था वो मेरे लिए,मन मे कई तरह की बातें चलने लगी, कहीं किसी ने गलत तरीके से छू लिया तो,किसी ने धक्का दिया तो,किसी ने हाथ लगाया तो.. क्योंकि इतनी भीड़ में किसे क्या कहेंगे।
पर जो हुआ वो मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं था।
पास में खड़े एक लड़के ने पूछा कि कहाँ उतरना हैं मैंने कहा जोगेश्वरी,सुनते ही उसने मुँह बनाया जो कि जायज भी था। इतनी भीड़ में एक मिनट के अंदर उस तरफ जाना खाने का काम नहीं था।
मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी सबने कॉपरेट किया और मुझे आगे जाने के लिए जगह दी मै आगे बढ़ते बढ़ते उतना ही कंफर्टेबल फील करने लगी जितना लेडीज़ कंपार्टमेंट में करती हूँ, ना किसी ने चांस मारा ना गलत तरीके से छुआ,ना किसी ने बेवजह हाथ लगाया।
उतरने के बाद एक बहुत अच्छी फीलिंग आयी।
क्योंकि अक्सर ऐसा ही होता हैं कि जब भी किसी भीड़भाड़ इलाके में कोई पुरुष मौके का फायदा उठा घटिया तरीके से छूता हैं तो बहुत घिन्न आती हैं बहुत पीड़ा होती है मन में।
तो #जेंट्स_डब्बे में इतने पुरुषों के बीच मेरा वो डर जायज़ था.. लेकिन उसदिन कुछ हद तक वो टूटा हुआ विश्वास थोड़ा थोड़ा जुड़ा था।
आये दिन रेप के, छेड़खानी के,मोलेस्टेशन के और भी कई किस्से अपने आसपास देखने के बाद मन मे एक दरार सी पड़ गयी हैं, किसी पे भी विश्वास करना मुश्किल सा हो गया हैं ऐसे में जब इस तरह की सहज घटनाओं से गुजरते हैं तो वो टूटा हुआ विश्वास कही न कही से फिर से जुड़ने लगता है।
आज जो भी शख्स मेरा ये पोस्ट पढ़ रहा हैं उनसे एक छोटी सी रिक्वेस्ट है कि जब भी आपके आसपास कोई अनजान लड़की हो तो उसे ये फील ज़रूर कराए की वो आपके साथ कंफर्टेबल हैं,कंफर्टेबल का मतलब उसके रक्षा से बिल्कुल नहीं, अपनी रक्षा तो वो खुद कर सकती हैं बल्कि ये की वो आपके आसपास होने पर उसे घिन्न आने की बजाय सहजता महसूस हो।
#It_was_a_happy_day
#किस्से_लोकल_के
Rekha Suthar



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