बचपन में जब भी कभी देर शाम को किसी अँधेरी गली से मैं मम्मी के साथ गुज़रती थी तो मम्मी का हाथ कस के पकड़ लेती थी और वही रुक जाने को बोलती थी क्योंकि आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता था.. तो मम्मी मुझे समझाती थी की "देखना,जैसे जैसे हम अँधेरे के नज़दीक जायेंगे सब साफ़ दिखने लगेगा,दूर से हर चीज धुंधली ही नज़र आती है, और सच में वैसा ही हुआ जैसे जैसे आगे बढे सब साफ साफ दिखाई पड़ रहा था और मैं बहुत खुश हो जाती थी.. मम्मी ने बोला अगर दूर से ही डर के हम वापस मुड़ जाते तो क्या पता चल पाता, के आगे अँधेरा था ही नहीं ?
फिर धीरे धीरे मम्मी मुझे अकेले भेजने लगी जब भी कोई काम पड़ा और धीरे धीरे मेरा डर निकल गया !
जैसे जैसे बड़ी हुई तो अंधेरो के मायने बदलने लगे अब जब ज़िन्दगी कई बार काली रात बन के सामने आ कर खड़ी हो जाती है तो वही बचपन वाली अँधेरी गली याद आती है और मम्मी की बात ! और मैं वैसे ही हिम्मत कर के आगे बढ़ जाती हूँ !
शायद उनको पता था के ज़िन्दगी में ऐसे कई अँधेरे आएंगे इसलिए वो मुझे डर के पीछे मुड़ जाने की बजाय हिम्मत से आगे बढ़ना सीखाया !

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