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Showing posts from 2015

"अमृता-ईमरोज़" एक अनोखा अनकहा अहसास ~

"अमृता-ईमरोज़" कहते है दफनाने के बाद सारे रिश्ते चंद दिनों में ख़त्म हो जाते है । जिसने भी कहा है झूठ कहा है | उन्हें हम बताएँगे कि जब रिश्ता रुह का रूह से होता है तो जिस्म भले ही राख हो जाए रूहानी रिश्ते ख़ाक नहीं होते | दुनिया के लिए भले ही तुम नहीं रही,  पर मेरे लिए तुम कल भी यहीं थी और आज भी यहीं मौजूद हो | घर के हरेक हिस्से में तुम्हारी मौजूदगी का अहसास होता है । यहाँ हर कोने में तुम ही तुम बसी हो । जब भी नंगे पैर मैं सैर करने निकलता हूँ तो साथ में दो कदमो के टहलने की आहट महसूस करता हूँ और अपने दाहिने हाथ पर हल्का  सा दबाव और गर्माहट का अहसास होता है । कभी कभी जब मैं अल्हड़पन में स्कूटर लेकर निकल पड़ता हूँ तब तुम्हारी उंगलिया मेरी पीठ पर आज भी "वही" नाम लिखती है और फिर आहिस्ते से तुम्हारे माथे का मेरी पीठ पर सहारा लेकर टिक जाना मुझे आज भी उतना ही सुकून देता है । मैं जानता था मेरे नसीब की बारिशें किसी और की छत पर हो रही है, फिर भी तुम्हारे एहसास की वो चंद बूंदें भी मुझे हर लम्हे तरोताजा रखती थी । आज भी मैं तुमसे वही बचकानी सी बातें किया करता हूँ और तुम ...

रौशनी

तेरे बाद कभी इस दिल में  रौशनी आने ही नही दी वरना टिमटिमाये तो थे कई सितारे दिल का अँधेरा मिटाने को ~ रेखा ~ "फ़ोटो गूगल से साभार"

उम्मीदों का सफ़र

चलती गई छनती रही  राह के काँटों को  बीनती रही  मुश्किलो का थाम के दामन खुशियों को न्यौछावर करती रही  मेरे हिस्से में भी होगी खुशियाँ रत्ती भर इसी ख्वाहिश में वक़्त के संग बहती रही  मेरे अंदर भी उमड़ रहा है एक सैलाब जज्बात का वक़्त आएगा मेरा भी ये खुद को हौसला देती रही  मंजिल की तलाश में निकले थे ये कदम घर से रास्तो ने दिया इतना प्यार के मंजिल ही भूल गयी  अंधेरो ने डराना चाहा बहुत के मुसाफिर कमजोर होगा और मैं मुस्कराती माँ की दुआओ संग चलती रही रेखा सुथार

"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी  का कप हाथ में लिए  याद आ रहे है वो  सर्दी के सुहाने दिन जब  नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय  दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार

"वजूद"

 गुमान था बहुत उसे अपने वजूद पे जरा सी ठोकर क्या लगी बिखर ही गया जैसे हैरान भी है,वो थोडा परेशान भी है कई हादसों के बाद भी जिसे आँच ना आने दी वो चंद शब्दों की कटारों से बिखरा कैसे ? कुछ खुद्दारी के बीज कुछ आत्मसम्मान की फसले थी जरा सी बारिश में ये खेत उजड़ा कैसे ? बुझ चुके है दिल में उम्मीदों के वो तमाम चिराग  घूँट जहर का पीने पर भी वो ज़िंदा कैसे ? रेखा सुथार

"बेनाम रिश्ता" (short_story)

"बेनाम रिश्ता" आज ज़िन्दगी के वो सीलन भरे हुए सारे बेरंग पन्ने आस पास यूँ बिखर गए जैसे बरसो पहले बिखरा था मैं जर्रा जर्रा उससे बिछड़ के... कोई रिश्ता नही था उससे मेरा पर वो अजनबी न जाने कब सांसो की जरुरत बन गई थी.. वो जब भी मेरे सामने आती थी तो बोतल बड़ी हैरानी से मुझे देखती थी `कि बिना उसको हाथ लगाये में नशे में झूम रहा हूँ.. तुम्हारे साथ बिताये उन सारे पलो को अपनी डायरी में रंगीन स्याही से कैद कर लिया था.. जायदाद के रूप में आज उसके सिवा कोई कीमती चीज नही मेरे पास.. जगजीत साब की वो गजल सुनी  "जिस्म की बात नही थी उन के, दिल तक जाना था, लंबी दूरी तय करने मे, वक़्त तो लगता है"  मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता रह गया और वो किसी और घर की इज्जत बन गई..  उंगलियाँ आज भी बस इस सोच में गुम हैं कि कैसे उसने नए हाथ को थामा होगा ? रेखा सुथर ~

"मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं"

~ मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं ना मैं शायर हूँ ना कवि हूँ मैं लिखा जो कभी दिल को छु जाए तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना प्यार लिखती हूँ ना नफरत लिखती हूँ  जो कभी पढ़ लो जज्बात तुम तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना सच लिखती हूँ ना झूठ लिखती हूँ  जो जैसा दीखता है वैसा ही लिखती हूँ दिख जाए जो सादगी लफ़्ज़ों की तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना जख्म लिखती हूँ ना दर्द लिखती हूँ बेजुबां लबो की आवाज लिखती हूँ जो सुन सको तुम भी वो ख़ामोशी  तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं रेखा ~

"वो कहाँ कठपुतली है" ?

वो हँसती है वो रोती है वो गाती है वो मुस्काती है वो हर रंग मैं ढल जाती है वो कहाँ कठपुतली हैं ? वो सहती है कुछ ना कहती है मन के भावो को बस शब्दों में पिरोती है पत्थर नही वो तो जज्बाती है वो कहाँ कठपुतली है ? सिर्फ कंठ ही नीला नहीं है वरन, घूंट जहर के वो हर दम पीती है दांव पे लगा के वो अपने वजूद को अपनों की ख़ुशीयाँ सींचती है वो कहाँ कठपुतली है ? कर्त्तव्य, दायित्व और समाज के बंधन में मात्र बंधी हुई है पर सांस फिर भी तो लेती है तो बोलो भला, वो कहाँ कठपुतली है ?

मुस्कान में अभिनय क्यों है ?

आँसुओ में सच्चाई मुस्कान में अभिनय क्यों है कहते है ज़िंदा है तो ज़िन्दगी से बेज़ार क्यों है लिखा नहीं ज़िन्दगी में साथ जिनका उन्हीं से हर मोड़ पे खुदा मिलवाता क्यों है   बेज़ुबां मूर्तियों के आगे भरे करोडो के भंडारे है उसी की देहलीज पे नन्हे हाथ तरसते क्यों है देखी है मैंने भी शहरो की चमक धमक पर इस रौशनी में चेहरे पहचानने मुश्किल क्यों है कहते है वो ज़माना गया जब मोहोब्बत सच्ची होती थी फिर आज भी सूखे हुए फूल किताबो में मिलते क्यों है.. रेखा सुथार