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#क्योंकि_वो_तीस_साल_बाद_मिल_रहे_थे

 ट्रेन में मेरे सामने वाली बर्थ पर एक बुजुर्ग अंकल आंटी  बैठे थे उनका रहन-सहन दिखने में काफी अच्छा था। आपस मे वो एकदूसरे से काफी सहजता और आत्मीयता से बात कर रहे थे,खैर रात काफी हो चुकी थी तो सब सो चुके थे मेरी आँख सुबह 4 बजे ही खुल गयी और फिर नींद ही नहीं आयी मैं खिड़की के पास अपना सर टिकाए बैठ गयी करीब पाँच बजे वो अंकल  ऊपर की बर्थ से नीचे उतरे मेरे सामने देख हल्का सा मुस्कराए मैं भी मुस्कराई फिर वो बिना कुछ बोले एक चटाई बिछाई नीचे और पर्दे को बंद करके वो नमाज पढ़ने बैठे उन्हें देखकर मैं सोचने लगी कि कितने पंचुअल होते है कुछ लोग अपनी प्रार्थना के और मैंने हमेशा ये सुना है कि अर्ली-मॉर्निंग में कि गयी प्रार्थना से हमारा दिन बेहद शानदार बीतता हैं मैंने कई बार कोशिश भी की सुबह जल्दी उठकर प्रार्थना में बैठने की पर कंटीन्यू नहीं हो पाई..
हां लेकिन नहाने के बाद हनुमान चालीसा का पाठ करना मेरी रोज की दिनचर्या में है।
कुछ देर बाद वो उठे और फिर मेरे सामने बैठ गए मैंने जिज्ञासावश पूछा -
- "अंकल आप रोज इतनी सुबह नमाज पढ़ते है" ?
- "हां बेटा दिन में पाँच बार "
- "मैं भी कई बार सोचती हूं कि सुबह जल्दी उठकर ध्यान करू पर मुझसे तो उठा ही नहीं जाता"

मेरी इस बात पर उन्होंने ठीक वही जवाब दिया जो अक्सर मेरे पापा भी कहते है वो बोले - 
"बेटा, ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि आपको सुबह उठकर भगवान की पूजा करने से ही भगवान या अल्लाह खुश होंगे या उनका हर रोज स्मरण करने से वो आपको सारी परेशानियों से निजात दिला देंगे पर यदि आपका मन साफ हैं और आप अपना जीवन ईमानदारी से जी रहे है किसी को आपकी वजह से नुकसान नहीं पहुच रहा तो ये आपके किसी भी इबादत से बढ़कर है"
मैं उनकी बात पर मुस्कराई और बोली कि अंकल एक और सवाल पूछू ?
वो मुस्कराते हुए बोले, "हां बिल्कुल पूछो ना" (तब तक आंटी भी हमारे पास आकर बैठ गयी थी)
- अंकल कल से आपके पास एक कॉल थोड़ी-थोड़ी देर में लगातार आ रही है और आप उन्हें लगभग हर स्टेशन के बारे में बड़े धैर्य से बता रहे है कि अब यहाँ पहुचे है अब यहाँ पहुचे है कौन इतना बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है ?
मेरे इस सवाल पर उनके चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान आयी और फिर वो बोले -
- "बेटा वो मेरा बचपन का दोस्त है कन्हैया लाल"
फिर उन्होंने पूरी कहानी बताई की कैसे वो दोनों बचपन मे पक्के दोस्त दो बदन एक जान हुआ करते थे। स्कूल की पढ़ाई साथ मे की स्कूल के बाद का सारा वक़्त एकदूसरे के साथ बीतता कभी वो मेरे घर खाना खाता तो कभी मैं उसके घर।
पढ़ाई भी एकसाथ ही करते एकदूसरे की दुनिया थे हम और फिर वो एकदिन आया जब मुझे आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना था और कन्हैया के पिताजी का ट्रांसफर किसी दूसरे शहर हो गया था हालात के सामने मजबूर होकर हमने एकदूसरे से वादा किया था कि हमेशा संपर्क में रहेंगे लेकिन वक़्त को कुछ और मंजूर था मेरे पिताजी ने शहर में आकर वहा मकान बना लिया और कन्हैया के पिताजी का ट्रांसफर किसी तीसरी जगह हो गया शुरू में मैंने उसका पता ढूंढने की कोशिश की और यकीनन उसने भी की होगी लेकिन नाउम्मीदी ही हाथ आयी फिर घर-गृहस्थी में मशगूल हो गए और कन्हैया एक याद बनकर ज़हन में बस गया।
लेकिन एकदिन अचानक पूरे तीस साल बाद कन्हैया का फोन आया मेरे पास उसकी आवाज़ सुनकर लगा जैसे कोई खोया खज़ाना मिल गया हो मुझको
(ये बताते हुए उनकी आँखें भर आयी थी) बस फिर क्या उसने अपनी सबसे छोटी बेटी की शादी का निमंत्रण दिया और मुझे तुरंत आने का आदेश दे दिया..

"तो उनको तीस साल बाद आपके नम्बर कैसे मालूम पड़े" ? मैंने फिर जिज्ञासावश पूछा

वो बोले "इसका जवाब तो मैं भी जानना चाहता हूं पर वो बोला सबकुछ मिलने पर बताऊंगा"
"तो वही है जो आपको बार-बार कॉल करके पूछ रहे है कि कहा पहुचे "? मैंने पूछा
वो हँसते हुए बोले - हां..
फिर उन्होंने अपने हैंड बैग से एक डायरी निकाली और मुझे कहा कि इस डायरी में मैंने कन्हैया के साथ जुड़ी हर याद को संजोए रखा हैं।
उन्होंने खोल के नहीं दिखाई वो डायरी और मैंने भी आग्रह नहीं किया।
तभी उनकी पत्नी जो बगल में ही बैठी थी मुझसे बोली कि - "इतना सब तो मुझे भी नहीं बताया जितना तुम्हे बताया है आज और इस डायरी के बारे में तो जब भी पूछा तो एक ही जवाब मिला कि ये निजी डायरी है हाथ ना लगाना" 
इस बात पे हम तीनों हँस पड़े..

इतने में उनका स्टेशन आ गया और वो चले गए जाते हुए अंकल ने मेरे सर पर हाथ रखते हुए कहा "खुश रहना बच्चा" और आंटी ने मुझे बड़ी आत्मीयता से गले लगाया..
मैंने देखा मुझसे विदा लेते हुए अंकल की आँखें भीग आयी थी।
कुछ लोग बेहद जज़्बाती होते है..

उनके मना करने के बाद भी मैं उनका सामान लेकर उन्हें ट्रेन के गेट तक छोड़ने गयी थी इस उम्मीद में की शायद मुझे भी कन्हैया लाल दिख जाए शायद मुझे तीस साल बाद दो दोस्तों की मुलाक़ात देखने को मिल जाये,
लेकिन मेरा वो काश काश ही रह गया भीड़ की वजह से नीचे उतरने में ही सारा वक़्त निकल गया और उनके उतरते ही ट्रेन चल पड़ी।
मैं वापस अपनी जगह पर आ कर बैठ गयी और खिड़की पर सिर टिकाए काफी देर तक यही सोचती रही कि उनकी मुलाक़ात कैसी हुई होगी मिलते ही दोनों ने भीगी आँखों से एकदूसरे को गले से लगाया होगा बचपन के किस्से फिर से ताज़ा हुए होंगे बीच मे आयी एक लंबी दूरी के शिकवे आँखों से झर रहे होंगे क्योंकि वो 'तीस साल बाद जो मिल रहे थे'

एक दुआ.. की बिछड़ो को ऐसे ही मिलाए ऊपरवाला ❣️
#किस्से_सफर_के

- Rekha Suthar

Comments

Unknown said…
Beautiful feelings in words

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