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Showing posts from April, 2020

some uncertain feelings

बचपन की तस्वीर देख रही थी साथ ही देख रही थी चेहरे की वो मासूमियत वो निश्छलता, फिर खुद को पलटकर आईने में देखा गौर से देखा.. मुझे चेहरे पे कही भी वो मासूमियत वो भोलापन नज़र नहीं आया। नज़र आई तो बस कुछ चालाकियां, हैरानियां,बेचैनियां और आँखों से लिपटे हुए कई रतजगे। मुझे याद है अभी एकदिन मम्मी से किसी बात पर बहुत जोर से लड़ाई हुई थी गुस्से में मैंने उन्हें बहुत सुना दिया था वो चुप थी जानती थी कि मैं जबतक मन मे भरा हुआ खाली नहीं करूँगी शांत नहीं हो पाऊंगी और कुछ देर बाद बोलते-बोलते जब मैं रो पड़ी तो उन्होंने अपनी गोद मे लिटा दिया मुझे और सिर को सहलाते हुए बोली -  "पता है जब तुम बहुत छोटी थी और तुतलाकर बोलती थी तब शाम के वक़्त अक्सर जब मैं चूल्हे पर रोटी बनाने बैठती तो तुम वही मेरे पास आकर बैठ जाती और जब चूल्हे में फूंक मारते वक़्त धुएं से मेरी आँखों मे पानी बहता तो मेरे साथ तुम भी जोर-जोर से फूंक मारने लगती पर तुम्हारी फूंक पहुच ही नहीं पाती लकड़ी तक तब तुम मेरे आँसू पोछ कर कहती कि जब मैं बड़ी हो जाऊंगी ना तो तुम्हारे लिए आग जलाऊंगी" बताते हुए मम्मी हँसने लगी और मैं और जोर से र...

#क्योंकि_वो_तीस_साल_बाद_मिल_रहे_थे

 ट्रेन में मेरे सामने वाली बर्थ पर एक बुजुर्ग अंकल आंटी  बैठे थे उनका रहन-सहन दिखने में काफी अच्छा था। आपस मे वो एकदूसरे से काफी सहजता और आत्मीयता से बात कर रहे थे,खैर रात काफी हो चुकी थी तो सब सो चुके थे मेरी आँख सुबह 4 बजे ही खुल गयी और फिर नींद ही नहीं आयी मैं खिड़की के पास अपना सर टिकाए बैठ गयी करीब पाँच बजे वो अंकल  ऊपर की बर्थ से नीचे उतरे मेरे सामने देख हल्का सा मुस्कराए मैं भी मुस्कराई फिर वो बिना कुछ बोले एक चटाई बिछाई नीचे और पर्दे को बंद करके वो नमाज पढ़ने बैठे उन्हें देखकर मैं सोचने लगी कि कितने पंचुअल होते है कुछ लोग अपनी प्रार्थना के और मैंने हमेशा ये सुना है कि अर्ली-मॉर्निंग में कि गयी प्रार्थना से हमारा दिन बेहद शानदार बीतता हैं मैंने कई बार कोशिश भी की सुबह जल्दी उठकर प्रार्थना में बैठने की पर कंटीन्यू नहीं हो पाई.. हां लेकिन नहाने के बाद हनुमान चालीसा का पाठ करना मेरी रोज की दिनचर्या में है। कुछ देर बाद वो उठे और फिर मेरे सामने बैठ गए मैंने जिज्ञासावश पूछा - - "अंकल आप रोज इतनी सुबह नमाज पढ़ते है" ? - "हां बेटा दिन में पाँच बार ...

वो शहर जो कभी रुकता नहीं था

सबकुछ थम सा गया है इस शहर में वो शहर जो कभी रुकने का या थमने का नाम नहीं लेता था जहाँ कभी रात रात सी नही लगती थी जहाँ हर जगह लोगों का मेला लगा रहता था जहाँ कोई भी रुकना नहीं जानता था.. वो शहर आज थम सा गया हैं। वो  9:55 की फ़ास्ट  लोकल छूट जाने पर 9:56 की स्लो पकड़ने का अफ़सोस अब थोड़े दिन नहीं रहेगा.. हाथ मे पहनी घड़ी भी टीवी के पास पड़ी आराम फरमा रही है.. जिन पड़ौसियों की शकल तक याद नहीं थी आज सब मिलकर एकदूसरे के घर खाने के नए-नए पकवान पूरी साफ-सफाई के साथ अदला-बदली कर रहे है.. नव्वे फ्लोर पर रहने वाले दोस्त से मिले हुए महीने भर से ऊपर हो गया था घर और ऑफिस के बाद कभी खुद के लिए भी तो वक़्त नहीं निकाल पाए थे अब वो पूरे-पूरे दिन साथ मे पत्ते खेलते है गप्पे मरते है बचपन के किस्सों को याद कर एकदूसरे की खूब खिल्ली उड़ा रहे है। खिड़की पे आने वाले कबूतर को जो हर बार मैं चिढ़ के उड़ा देती थी अब उससे गुटरगूँ करना भी अच्छा लग रहा है। जाने कबसे सोच रखा था की कभी ऑफिस से जल्दी आयी तो चीज़ कॉर्न बॉल्स पर अपना एक्सपेरिमेंट करूँगी पर ये वक़्त ही तो नहीं मिल पाता था कमबख्त,और अब देखो सबके पास वक्त ही...

वो समंदर किनारे बैठी थी

वो समंदर किनारे बनी पाली पर बैठी हुई थी,अक्सर यहाँ पर लोग दोस्तों के साथ,फैमिली के साथ या किसी ना किसी के साथ ही नज़र आते हैं। ऐसे में जब कोई अकेला अपने घुटनों को खुद में समेटे हुए बैठा दिखता हैं तो थोड़ा अजीब सा लगता हैं.. अजीब सा लगना मतलब हैरानी होती हैं। मैं बहुत देर से उसे देख रही थी थोड़ी दूर से,वहा बहुत से लोग थे पर पता नहीं क्यों मेरी नज़रें बस उसी पर अटकी हुई थी। इस शहर की खासियत यहीं हैं कि यहाँ किसी को किसी की खबर नहीं रहती, भीड़ से भरे इस शहर का अकेलेपन से गहरा लगाव हैं। हाँ,अकेलेपन का हर बार ये मतलब निकलना ज़रूरी नहीं होता कि कोई परेशान या दुःखी होता हैं तभी कही अकेले जा के बैठता हैं,बल्कि कई बार हर एक के जीवन मे ऐसे पलों का आना मुनासिब हैं जब उन्हें खुद के साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता हैं, खुद से सवाल जवाब करते हुए खुद से मिलना अच्छा लगता हैं,खुद के लिए उदास होना,खुद के लिए मुस्कराना अच्छा लगता हैं। मौसम इतना प्यारा था कि मैं भी उन लहरों के करीब जाने से खुद को रोक नहीं पायी। मैं उस लड़की के ठीक बगल में जा के बैठी,पैरों को खुद में समेटे  वो एकटक समंदर की लहरों को देख रह...

बचपन की पिटाई

मैं बचपन से ही बहुत शरारती रही हूँ.. गाँव में मेरा रॉब पड़ता था अपनी स्कुल की मैं हीरो थी कोई भी काम मेरे और मेरी टीम के बिना नहीं होता था इतनी दबंग थी के गाँव में कोई भी पंगा लेने से पहले चार बार सोचता था ! पर किसी को भी ये मालूम नहीं था के आम तौर पे जहा लोग दिन में तीन बार खाना खाते है वैसे ही मैं दिन में तीन बार मम्मी के हाथ की मार खाती थी.. मेरी मार खाने का एक कमरा तय था जब भी मैं कोई शरारत करती मम्मी हाथ पकड़ कर मुझे उसी कमरे में ले जा कर मेरी अच्छे से खातिर करती बस कभी कभी पापा की वजह से बच जाती.. एक दिन की बात है गाँव में तब बहुत कम घरो में टीवी थी आस-पास के पडौसी सब हमारे घर पे शाम को "रामायण" आती थी तो सब देखने आते थे पूरा हॉल लगभग भर जाता था ! उस दिन मैं बहुत खुश थी की मेरी सिर्फ दो बार ही पिटाई हुई और अब तो रात हो गई थी अब तो थोड़ी देर में सब सो जायेंगे तो मैं भी सबके बीच बैठी सब शांति से रामायण देखने लग गयी तभी मुझे प्यास लगी सामने की तरफ मिट्टी के दो मटके भरे हुए थे मैं उनकी तरफ बढ़ी तो मेरी आंटी वही बैठी हुई थी बोली रुक मैं पिला देती हूँ मैंने कहा आप परेशान ना ह...

सबक

कुछ अजनबी लोग हमारी ज़िन्दगी में हमे सिर्फ सबक देने आते है, सबक ये के कभी किसी पर अँधा विश्वास मत करो, और कर भी लो तो इतना करीब ना बनाओ के वो आस्तीन के साँप बन जाये ! ऐसे लोग इतने शातिर होते है इतना भरोसा दिलाते है अपनेपन का की हम चाह कर भी उनके लिए अलग धारणा नही बना सकते, इनके लिए रिश्ते सिर्फ "लाभ-हानि" का मात्र एक खेल होता है जब तक फायदा मिले निभाते रहो और नुक्सान का जरा सा आभास होते ही अँधेरे में गुल हो जाते है ! ऐसे लोग भगवान् की बनाई स्पेशल वाली कैटेगरी में आते है जिनका काम होता है बस "विश्वासघात करना" "रिश्तों को अपनी सुविधानुसार सेट रखना" "मासूमियत का नकाब पहने रखना" "रिश्तों में फुट डालना" जैसे और भी कई कामो में ये महारत हासिल किये होते है और ताज्जुब की बात ये है की ये सब करने के बाद भी इनके माथे पे शर्म की शिकन तक नही दिखती.. ऐसे इंसान सबकी ज़िन्दगी में एक बार तो दस्तक देते ही है और ज़िन्दगी भर की एक टीस दिल में छोड़ जाते है.. ये दीमक की तरह होते है जो धीरे धीरे रिश्तों की नीव हिलाते है और जबतक पता चलता है इनके बारे में तब तक...

माँ सब जानती थी

बचपन में जब भी कभी देर शाम को किसी अँधेरी गली से मैं मम्मी के साथ गुज़रती थी तो मम्मी का हाथ कस के पकड़ लेती थी और वही रुक जाने को बोलती थी क्योंकि आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता था.. तो मम्मी मुझे समझाती थी की "देखना,जैसे जैसे हम अँधेरे के नज़दीक जायेंगे सब साफ़ दिखने लगेगा,दूर से हर चीज धुंधली ही नज़र आती है, और सच में वैसा ही हुआ जैसे जैसे आगे बढे सब साफ साफ दिखाई पड़ रहा था और मैं बहुत खुश हो जाती थी.. मम्मी ने बोला अगर दूर से ही डर के हम वापस मुड़ जाते तो क्या पता चल पाता, के आगे अँधेरा था ही नहीं ? फिर धीरे धीरे मम्मी मुझे अकेले भेजने लगी जब भी कोई काम पड़ा और धीरे धीरे मेरा डर निकल गया ! जैसे जैसे बड़ी हुई तो अंधेरो के मायने बदलने लगे अब जब ज़िन्दगी कई बार काली रात बन के सामने आ कर खड़ी हो जाती है तो वही बचपन वाली अँधेरी गली याद आती है और मम्मी की बात ! और मैं वैसे ही हिम्मत कर के आगे बढ़ जाती हूँ ! शायद उनको पता था के ज़िन्दगी में ऐसे कई अँधेरे आएंगे इसलिए वो मुझे डर के पीछे मुड़ जाने की बजाय हिम्मत से आगे बढ़ना सीखाया ! रेखा सुथार ~

सबक जो जीवन भर साथ रहे

बचपन में हमारे मोहल्ले में एक छोटी सी दुकान थी जब भी हमे चवन्नी या अठन्नी मिलती थी तो हम सीधे वही भागते थे ! एक दिन मैं एक रूपया लेकर गई वहा अठन्नी की चॉकलेट ली और अठन्नी वापस लेनी थी,उन अंकल को कम दिखने वजह से गल्ले से अठन्नी की जगह मुझे पाँच का सिक्का दे दिया.. ये देख कर मेरी और मेरी पूरी गैंग की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा क्योंकि पाँच रुपये सबमे बंटने थे.. मैं सबसे पहले भाग के घर गई और बाहर मेरे दोस्त ये तय कर रहे थे के हम उन पैसो का क्या क्या लेंगे ! मैंने जाते ही वहा पापा को देखा तो बड़ी खुश हो के उन्हें सारी बात बताई "सोचा सरदार खुश होगा साबासि देगा"..  पर पापा ने ये जानते ही मेरा कान... नहीं नहीं हाथ पकड़ा और मुझे ले गए उसी दूकान पर वहा पैसे वापस दिलवाये और माफ़ी भी मंगवाई... मैं मुँह लटका के घर आयी सभी दोस्त हँस रहे थे मुझे देख कर, फिर पापा ने बहुत अच्छे से समझाया के कभी किसी की कमजोरी का गलत फायेदा मत उठाना क्या पता उसने कितनी मेहनत कर के वो पैसे कमाए होंगे ! ये किस्सा इसलिए याद आया की अभी कुछ दिन पहले शाम के समय मैं और मेरी सिस्टर रीटा नुक्कड़ पर एक अंकल से कुछ सामान...

अमृता इमरोज का अनकहा रिश्ता

"अमृता-ईमरोज़" कहते है दफनाने के बाद सारे रिश्ते चंद दिनों में ख़त्म हो जाते है । जिसने भी कहा है झूठ कहा है | उन्हें हम बताएँगे कि जब रिश्ता रुह का रूह से होता है तो जिस्म भले ही राख हो जाए रूहानी रिश्ते ख़ाक नहीं होते | दुनिया के लिए भले ही तुम नहीं रही,  पर मेरे लिए तुम कल भी यहीं थी और आज भी यहीं मौजूद हो | घर के हरेक हिस्से में तुम्हारी मौजूदगी का अहसास होता है । यहाँ हर कोने में तुम ही तुम बसी हो । जब भी नंगे पैर मैं सैर करने निकलता हूँ तो साथ में दो कदमो के टहलने की आहट महसूस करता हूँ और अपने दाहिने हाथ पर हल्का  सा दबाव और गर्माहट का अहसास होता है । कभी कभी जब मैं अल्हड़पन में स्कूटर लेकर निकल पड़ता हूँ तब तुम्हारी उंगलिया मेरी पीठ पर आज भी "वही" नाम लिखती है और फिर आहिस्ते से तुम्हारे माथे का मेरी पीठ पर सहारा लेकर टिक जाना मुझे आज भी उतना ही सुकून देता है । मैं जानता था मेरे नसीब की बारिशें किसी और की छत पर हो रही है, फिर भी तुम्हारे एहसास की वो चंद बूंदें भी मुझे हर लम्हे तरोताजा रखती थी । आज भी मैं तुमसे वही बचकानी सी बातें किया करता हूँ और तुम ...

नमकीन चाय (एक लंबी कहानी)

टिप टिप टिप... बूंदें टपक रही थी,पूरे दो दिनों बाद बारिश ने आज राहत की साँस ली थी ! बारिश के दिनों में नैनीताल का मौसम तालाब से भीग के आये एक नटखट से बच्चे जैसा हो जाता है बिल्कुल। वहाँ ठीक सामने एक बड़ा सा दरिया है जिसमे लिपटा हुआ पूरा शहर जगमगाता हुआ दिखाई पड़ रहा था ! करीब एक बज चूका था मैं अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम कर रही थी,देर तक काम करना अब आदत सी हो गई थी। थोड़ी सी थकान महसूस होने लगी तो अपने लिए चाय उबाल लायी और फिर रोज की तरह हॉल की उस बालकनी में बैठ अपने रेशम के कम्बल में घुस कर अपने दोनों पैरो को खुद में समेटकर बैठ गई और ऊपर टंगे उस तन्हा चाँद के साथ अपनी तन्हाई बाँटने लगी। ऊपर से जितना चमकीला और खुशनुमा लगता है अंदर से उतना ही उदास और बेजान सा है वो, बिल्कुल मेरे मन की तरह ! चाय की चुस्की के साथ उसकी तरफ एक टक देखे जा रही थी हम दोनों में अक्सर ऐसे ही ख़ामोशी में बातें हुआ करती है शाम होते ही मैं अपने चाय के कप और गरम कम्बल के साथ उसके सामने शिकायतों का पिटारा खोल के बैठ जाती हूँ,कभी अपनी बॉस के सख्त मिजाज़ पर गुस्सा दिखाती हूँ तो कभी अपने कॉलीग द्वारा मुझे बेवजह परेशान क...

प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं

जब भी कभी मेरे सामने बायो डाटा भरने का सवाल आता हैं जहाँ अक्सर यहीं लिखा या कहा जाता है 'कम शब्दों में अपने जीवन के बारे में बताए' ऐसे में दिमाग शून्य हो जाता है। समझ नहीं आता ऐसे कम शब्द कहा से लाये जो अभी तक के पूरे जीवन को बयां कर दे। वो तमाम उतार-चढ़ाव वो संघर्ष वो त्याग वो घुटन भरे दिन, बोझिल सी शामें,किसी अपने को खोने का दर्द ,अपनों के खातिर त्यागी हुई खुशियां,आँखों से ओझल होते सपने,हर कदम पर सहारा बनते पैरेंट्स के कंधे,किसी का निस्वार्थ प्रेम,किसी की नफरत भरी निगाहों से तार-तार हुआ दिल, मन के शमसान में दफनाई हुई उन तमाम ख्वाहिशों को कैसे समेट के रख दे उन चार लाइन वाले कॉलम में ?  वो फिर भी कहते हैं कि कम शब्दों में बताओ अपने जीवन के बारे में। तो फिर बतानी पड़ती हैं वो बेबुनियादी दिखावी बातें, वो बड़ी बड़ी डिग्रियां,वो रट्टे मार मार के कमाए नंबर्स और खोखले फ्यूचर प्लान्स। #प्रेक्टिकल_ज़माने_में_जज़्बाती_होना_गुनाह_सा_लगता_हैं रेखा सुथार

सुनो लड़की, ये सिर्फ तुम्हारे लिए

 हर कोई तुम्हे अपने नज़रिये से जज करेगा तुम्हारी खूबियों को दरकिनार कर वो लोग तुम्हारी हर कमी को गिनाएंगे तुम्हारे हर ऐब पर उंगली उठाएंगे, मगर तुम इसकी परवाह मत करना अपने अस्तित्व को खूब जीना अपनी कमियों से मायूस न होना वो तुम्हे और बेहतरीन इंसान बनाएगी। बंदिशों को अपनी किस्मत समझ तुम बैठी मत रहना किसी कोने में.. आँगन में बिखरे पंखों को समेट तुम उड़ने की कोशिश जारी रखना नाप लेना आसमान के हर एक कोने को और शाम होते ही लौट आना अपने घोंसले की और की अब तुम्हे पिंजरे और घोंसले में फर्क समझना होगा। इस ज़िन्दगी के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी तुम्हारा इंतज़ार नहीं करेगी.. लेकिन 'इस' ज़िन्दगी में कई सारी चीजें ऐसी है जो सिर्फ तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। कभी भी लड़की होने की वजह से खुद को कमजोर मत पड़ने देना ये तो इस समाज का एक ढकोसला भर है। यहाँ कोई भी तुम्हारी आज़ादी से खुश नहीं होगा, लेकिन तुम्हे अपनी आजादी खुद चुननी होगी और जिस दिन तुम एक मुकाम पर पहुच जाओगी उसदिन हर कोई तुम तक पहुचने की कोशिश करेगा  इसलिए तुम सिर्फ अपने दिल पर विश्वास करना और अपने होने पर हर पल गर्व महसूस करना होगा। क्योंकि त...

वो जानती थी ज़रूरी क्या है

"वो जानती थी कि सबसे ज़रूरी क्या है" कुछ तकनीकि खराबी की वजह से ट्रेन एक स्टेशन पर करीब बीस मिनट तक खड़ी रही। आज रोज के मुकाबले लोकल ट्रेन में भीड़ कम थी एकदम उबाऊ सी शाम थी ये या शायद मेरा मन ही आज ऐसा था कि मुझे हर चीज उबाऊ सी लग रही थी। मैं रोज की तरह खिड़की पर सिर टिकाए हाथ में किताब लिए (अक्सर कानों में इयरफोन होते है मगर आजकल कुछ अधूरी रही किताबों को धीरे-धीरे पूरा कर पाने की कोशिश कर रही हूं) एक पेरेग्राफ पर अटकी हुई थी तभी मेरी नज़र सामने के प्लेटफार्म पर बैठी एक करीब 16-17 साल की लड़की और उसी का हमउम्र लड़के पर पड़ी। लड़का बेहद ही क्यूट था इस बेहद पर और ज्यादा जोर लगा ले तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी लेकिन थोड़ा सा ढीठ था 'क्यों' वो आगे बताऊंगी और लड़की बिल्कुल चंचल प्यारी सी बेहद शांत लग रही थी। उस प्लेटफार्म पर मुश्किल से दो-चार ट्रेन आती होगी दिन में इस वजह से वहा लोग बिल्कुल ना के बराबर थे प्लेटफार्म लगभग खाली था। वो दोनों एक बैंच पर बैठे थे लड़का किसी बात से बेहद नाराज़ लग रहा था और लड़की पूरी शिद्दत से उसे मनाने की कोशिश में लगी थी मानो उसकी गलती ना होते हुए भ...

यही किस्से है जो मेरे हिस्से है

शाम को 6 बजे के आसपास लोकल में चढ़ने के लिए बस दरवाजे पर खड़े हो जाओ उसके बाद अंदर आपको कैसे जाना हैं किधर जाना हैं का फैसला पीछे और आगे खड़ी भयंकर भीड़ तय करती है। उस भीड़ में अगर आप अपनी मुंडी हिला पा रहे है तो यकीन मानो खुशकिस्मत हो तुम 😂 और जब इतनी भीड़ में कोई सीट पर बैठी महिला/लड़की कह दे के बैठ जाओ मैं अगले स्टेशन पर उतर रही हूँ तो एकाएक मन से एक आवाज़ आती हैं "बहन,अब रुलायेगी क्या" 🤣🤣🤣🤣 #किस्से_लोकल_के  ❣️ रेखा सुथार

सीखना ज़रूरी था

हम में से कुछ लोगों की एक आदत बन चुकी हैं कि जब भी हम बस में,ट्रैन में,टैक्सी में या ऑटो में सफर करते वक़्त अगर पास में कुछ कचरा या स्नैक्स खाने के बाद वो पॉलीथिन को हम विंडो से बाहर फेंक देते हैं। लोकल में भी कई बार ऐसा कोई न कोई करता मिल ही जाता हैं.. आज फिर मेरे बगल में बैठी आंटी ने अपने बच्चे को कुछ खिलाने के बाद उस पेपर को रैप करके ट्रैन की जालीनुमा खिड़की से बाहर फेंकने लगी तो मैंने मुस्कराकर उनसे धीरे से कहा कि  'आंटी,डस्टबिन में फेंक देना ना' .. वो कुछ नहीं बोली,और उस रैपर को अपने हाथ मे ही रख लिया। मुझे अगले स्टेशन पर ही उतरना था तो मैंने कहा लाओ मुझे दे दो मैं डाल दूंगी। मुझे नहीं पता उन्होंने क्या सोचा होगा, ऐसा भी नहीं कि वो सफाई के प्रति सजग नहीं होगी,बेशक वो अपने घर और आसपास को स्वच्छ रखती होगी। पर ये फेंकने की बात हैं वो कही न कही हमारी आदतों में शुमार हो गयी हैं जो कि काफी हद तक ख़तम भी हुई हैं। मैंने भी पहले कई बार आसपास की नज़रों से बच-बचाके कई रैपर बस की विंडो से बाहर फेंके हैं ऐसे ही एक दिन सबसे नज़रें चुराकर चिप्स का खाली पैकेट फेंकने ही वाली थी कि ...

भीड़ भरा जेंट्स डिब्बा

कुछ दिन पहले की बात हैं, शाम को करीब 5-6 बजे अंधेरी से लोकल पकड़नी थी, यहाँ मुम्बई में सारी सवारी एक तरफ और लोकल की सवारी एक तरफ कोई मुकाबला ही नहीं है लोकल का हर मायने में.. वैसे तो इसके बहुत सारे फायदे हैं तो वही कुछ नुकसान भी हैं। तो मैं लोकल पकड़ने के लिए खड़ी थी कुछ देर बाद ट्रेन आ गयी इतनी भयंकर भीड़ देखकर एक बार तो चढ़ने की कोशिश की पर मजाल की वो औरतें मेरी कोशिश को कामयाब होने देती और कड़ी मशक्कत के बाद भी नही चढ़ पायी। कुछ ही सेकेंड में ट्रेन निकल पड़ी उस दौरान आप चढ़ गए तो चढ़ गए रह गए तो रह गए। ट्रैन चली ही थी कि तभी लेडीज़ डब्बे से अचानक एक लड़की गिर पड़ी जो कि मेरे सामने ही चढ़ चुकी थी,अगर उस पोलिस वाली मोहतरमा ने तुरंत हाथ पकड़ के नहीं खींचा होता तो..... बस बाल-बाल बची उसने बताया कि वो तो दरवाजे से अंदर की तरफ जा चुकी थी पर दो औरतों ने उसे जोर से धक्का दिया और वो संभल नहीं पायी.. अब क्या टिप्पणी करू इसपर। वैसे मुझे रोज खाली लोकल ही मिलती हैं आते-जाते दोनो वक़्त पर उसदिन दूसरा रूट था। खैर, तभी दूसरी लोकल आ चुकी थी और डर के मारे मैं लेडीज़ कंपार्टमेंट में चढ़ने की बजाय जेंट्स कं...

लोकल वाला इश्क

वो दोनों जेंट्स डब्बे में गेट पर खड़े थे। मैं वही सामने की सीट पर बैठी थी। लड़का दिखने में बेहद स्मार्ट और लड़की बाकमाल खूबसूरत थी। पिछले चार स्टेशन से लड़की लगातार बोले जा रही थी एक पल भी चुप होने का नाम नहीं लिया मानों दोनों कई दिनों बाद मिले हो और लड़की को अपने बीते उन तमाम दिनों में हुई हर छोटी से बड़ी घटना लड़के को बतानी हैं। लड़का चुप था बड़ी ही शिद्दत से लड़की की हर बात को गौर से सुन रहा था। लड़की बात करते-करते कभी उसके कंधे पर हाथ रख देती तो कभी हौले से उसकी उंगली अपनी उंगली में झकड़ लेती और इस सिचुएशन में लड़का थोड़ा सा घबराता इधर-उधर आँखे मटकाता और बड़ी ही नजाकत से वो कभी लड़की का हाथ अपने कंधे से हटाता तो कभी उसकी उंगली उसकी गिरफ्त से निकाल लाता। ये सिलसिला कई देर तक चलता रहा। लड़के का ऐसे बार-बार उससे उंगली छुड़ा लेना लड़की को बुरा लगा,वो अचानक चुप हो गयी और अपने जेब से फ़ोन निकाल उसमें व्यस्त होने का नाटक करने लगी। लड़का अब भी चुप था गेट की तरफ देख मुस्कुरा रहा था,और करीब दो मिनट बाद लड़के ने हलके से लड़की की चारों उंगलियों को अपनी उंगलियों में झकड़ लिया और उसका हाथ मजबूती से पकड़ ल...

मन के खाली कोने

#इस_दुनिया_मे_शिकायत_करती_नज़रों_और_चीख़ती_हुई_खामोशी_से_खतरनाक_शायद_कुछ_नहीं_हो_सकता वो स्टेशन पर खड़ी थी चेहरा पूरा सूजा  हुआ सा और आँखें एकदम लाल पड़ी हुई थी। ऐसा चेहरा अक्सर जी भर के रोने के बाद ही होता हैं। ट्रैन के आने में अभी पाँच मिनट थे, वो सामने की तरफ आती-जाती ट्रेनों को लगातार एकटक देखे जा रही थी। वो अब भी भरी हुई थी अंदर से मानो अगर किसी ने कुछ पूछ लिया तो वो रो देगी। तभी एक लड़का दौड़ा हुआ आया और उसके पास आकर खड़ा हो गया। वो उसकी तरफ नहीं देख रही थी। लड़के ने उसका हाथ पकड़ कर उसे थोड़ा साईड में ले गया,उसने उसके दोनों हाथ पकड़े हुए थे लड़की अब भी चुप थी लड़का भी खामोशी से उसकी तरफ देख रहा था मानो उसकी नज़र उससे कह रही हो कि 'मत जाओ'.. लड़की की भीगी कतारों से अब बूँदें एक-एक करके बिखरने लगी (जब मन के भीतर सबकुछ बिखरा हो तो इन चंद बूंदों का बह जाना लाज़मी हैं) लड़की ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की मगर लड़के की मजबूत पकड़ से छुड़ा नहीं पायी। ट्रैन आ चुकी थी लड़की ने लड़के की तरफ गुस्से और हैरानी भरी नज़रों से देखा अब लड़के ने हाथों को छोड़ दिया था। (ऐसी नज़रों से हम किसी को तभी देखते हैं...

लेकिन ये कहानी नहीं है #अल्जाइमर

वो लेडिस डब्बे में मेरे बगल में बैठी थी। मैं रोज की तरह इयरफोन लगा के अपनी फिक्स विंडो सीट पर बैठी थी। कानों में खानुम आपा बार बार कह रही थी "आज जाने की ज़िद ना करो".. (उनकी आवाज़ में जो कसक जो खनक है वो शायद ही कभी किसी और आवाज़ में महसूस हुई हो)। हर स्टेशन पर वहा खड़े लोगों की एक्टिविटी को ऑब्ज़र्व करना मेरा रोज का काम हैं। मैं अपने मे ही गुम थी कि तभी मैंने महसूस किया कि मेरे ठीक बगल में बैठी एक बुजुर्ग महिला मुझे कुछ कहना चाह रही है जब मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे बुलाया तो मैंने कानों से ईयरफोन निकाल उनसे माफ़ी मांगते हुए मैंने कहा- "बोलिये ना आंटी क्या हुआ" ? वो करीब अंदाजन साठ साल की एक एक्टिव लेडी लग रही थी। वो बोली "बेटा सांताक्रुज कब आएगा" ? मैंने कहा "आंटी अभी से चार स्टेशन बाद आएगा" मुझे थोड़ा अजीब लगा उनका ये सवाल क्योंकि दिखने में कोई नौकरीपेशा लग रही थी, पर फिर सोचा हो सकता है ये पहली बार सफर कर रही हो लोकल में। और मैं फिर से खिड़की की तरफ पलट गयी मैंने दो मिनट बाद उनकी तरफ देखा तो वो काफी परेशान दिख रही थी तो मैंने पूछा ...

सुनहरे बालों वाली लड़की

सुनहरे बालों वाली लड़की के नाम ❣️ ************ वो मेरी स्कूल के गेट के बाहर एक कच्चे से झोपड़ी नुमा घर मे अपने परिवार के साथ रहती थी। उस घर पे सारे पुरुष दिनभर लोहे को पीट-पीटकर औजार बनाते और महिलाएं उन औजारों को पूरे गाँव मे घर-घर बेचने जाती। ये सब मैंने पहले कभी नोटिस नहीं किया था कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई उस तरफ ध्यान देने की वैसे भी फुटपाथ पर रहने वालों पर हम कितना ध्यान दे पाते हैं ? सो मैंने भी नही दिया था कभी। हर रोज शाम को हम स्कूल के ग्राउंड में सॉफ्टबॉल की प्रैक्टिस करने जाती थी और शॉट मारते हुए हर रोज हमारी बॉल एक बार तो उसके घर मे चली ही जाती और उस बॉल के चक्कर मे हर रोज मेरी उस लड़की से लड़ाई होती। एक बार तो बात इतनी बिगड़ गयी के हम एकदूसरे को मारने पीटने पर आ गए। जब हम पर कोई रौब जाड़ता है तो हमारा ईगो कितना हर्ट हो जाता है और फिर उस ईगो को शांत करने के लिए हम कब अपने स्तर से नीचे गिरने लगे जाते है पता ही नहीं चलता.. मेरे साथ भी उसदिन ऐसा ही हो रहा था। मुझसे ये भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि उस मामूली सी लड़की की इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि वो मुझे हाथ भी लगाए.. अहंक...