आज किसी ज़रूरी काम से मलाड जाना था। घर से निकलते-निकलते पहले ही देर हो गई थी, और रास्ते में पोस्ट ऑफिस का एक काम भी निपटाना था। सोचा था कि 5-10 मिनट में काम हो जाएगा, लेकिन वहाँ पहुँचकर पोस्ट ऑफिस की हालत देखकर समझ आ गया कि दस मिनट में तो कुछ भी नहीं होगा। मेरे आगे सिर्फ दो लोग खड़े थे, तो लगा कि मेरा नंबर जल्दी आ जाएगा, लेकिन जैसे ही मेरी बारी आई, इंटरनेट बाबू को कहीं जाने की जल्दी हो गई। करीब 15 मिनट इंतज़ार के बाद इंटरनेट चालू हुआ, और मेरा काम प्रोसेस में ही था कि एक बुजुर्ग महिला आईं और बोलीं, “बेटा, मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता। क्या मैं पहले अपना काम करवा लूँ?” मैं कुछ कहती, इससे पहले मेरे पीछे खड़े आदमी ने सख्त आवाज़ में कहा, “हम लोग कब से लाइन में खड़े हैं। अगर आपने इन्हें पहले जाने दिया, तो फिर आपको भी अपना काम हमारे बाद ही करवाना होगा।” मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप आंटी को अपनी जगह दे दी। खुद जाकर तीन लोगों के पीछे खड़ी हो गई। “आजकल मुझे हर बुरी लगने वाली बात पर चुप रहना ही सही लगता है।” कई बार मन उलझा होता है, और जब उसे सुलझाने का कोई रास्ता नज...
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"कागज़ पर ख़ामोश
बैठी एक अधूरी
ग़ज़ल .............. उन रूठे हुए
लफ़्ज़ों की राह तक
रही है जो ज़रा सी
बात पर मुँह मोड़ गए
है,वैसे ही जैसे तुम गए
थे उस रोज़.."
- रेखा