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माज़ी


मैं अब अक्सर माज़ी की छाँव
में बैठ उन पुराने लम्हों में
सिगरेट की तरह
लम्हा दर लम्हा सुलगता रहता
हूँ ,
बिखर सा गया हूँ उस
पुराने कमरे में पड़ी बिखरी चीजों
की तरह और सोचता हूँ एक
रोज़ तुम लौट आओगी
और समेट लोगी मुझे खुद में ~

रेखा सुथार

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