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"बेनाम रिश्ता" (short_story)


"बेनाम रिश्ता"
आज ज़िन्दगी के वो सीलन भरे हुए सारे बेरंग पन्ने आस पास यूँ बिखर गए जैसे बरसो पहले बिखरा था मैं जर्रा जर्रा उससे बिछड़ के... कोई रिश्ता नही था उससे मेरा पर वो अजनबी न जाने कब सांसो की जरुरत बन गई थी.. वो जब भी मेरे सामने आती थी तो बोतल बड़ी हैरानी से मुझे देखती थी `कि बिना उसको हाथ लगाये में नशे में झूम रहा हूँ.. तुम्हारे साथ बिताये उन सारे पलो को अपनी डायरी में रंगीन स्याही से कैद कर लिया था.. जायदाद के रूप में आज उसके सिवा कोई कीमती चीज नही मेरे पास..
जगजीत साब की वो गजल सुनी
 "जिस्म की बात नही थी उन के, दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने मे, वक़्त तो लगता है" 
मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता रह गया और वो किसी और घर की इज्जत बन गई..  उंगलियाँ आज भी बस इस सोच में गुम हैं कि कैसे उसने नए हाथ को थामा होगा ?

रेखा सुथर ~

Comments

यह किसने लिखा है ??
Rekha suthar said…
मैंने लिखा.... क्यों ?

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