गुमान था बहुत उसे अपने वजूद पे
जरा सी ठोकर क्या लगी बिखर ही गया जैसे
हैरान भी है,वो थोडा परेशान भी है
कई हादसों के बाद भी जिसे आँच ना आने दी
वो चंद शब्दों की कटारों से बिखरा कैसे ?
कुछ खुद्दारी के बीज कुछ आत्मसम्मान की फसले थी
जरा सी बारिश में ये खेत उजड़ा कैसे ?
बुझ चुके है दिल में उम्मीदों के वो तमाम चिराग
घूँट जहर का पीने पर भी वो ज़िंदा कैसे ?
रेखा सुथार

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