Skip to main content

"बेनाम रिश्ता" (short_story)


"बेनाम रिश्ता"
आज ज़िन्दगी के वो सीलन भरे हुए सारे बेरंग पन्ने आस पास यूँ बिखर गए जैसे बरसो पहले बिखरा था मैं जर्रा जर्रा उससे बिछड़ के... कोई रिश्ता नही था उससे मेरा पर वो अजनबी न जाने कब सांसो की जरुरत बन गई थी.. वो जब भी मेरे सामने आती थी तो बोतल बड़ी हैरानी से मुझे देखती थी `कि बिना उसको हाथ लगाये में नशे में झूम रहा हूँ.. तुम्हारे साथ बिताये उन सारे पलो को अपनी डायरी में रंगीन स्याही से कैद कर लिया था.. जायदाद के रूप में आज उसके सिवा कोई कीमती चीज नही मेरे पास..
जगजीत साब की वो गजल सुनी
 "जिस्म की बात नही थी उन के, दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने मे, वक़्त तो लगता है" 
मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता रह गया और वो किसी और घर की इज्जत बन गई..  उंगलियाँ आज भी बस इस सोच में गुम हैं कि कैसे उसने नए हाथ को थामा होगा ?

रेखा सुथर ~

Comments

यह किसने लिखा है ??
Rekha suthar said…
मैंने लिखा.... क्यों ?

Popular posts from this blog

"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी  का कप हाथ में लिए  याद आ रहे है वो  सर्दी के सुहाने दिन जब  नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय  दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार

"मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं"

~ मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं ना मैं शायर हूँ ना कवि हूँ मैं लिखा जो कभी दिल को छु जाए तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना प्यार लिखती हूँ ना नफरत लिखती हूँ  जो कभी पढ़ लो जज्बात तुम तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना सच लिखती हूँ ना झूठ लिखती हूँ  जो जैसा दीखता है वैसा ही लिखती हूँ दिख जाए जो सादगी लफ़्ज़ों की तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना जख्म लिखती हूँ ना दर्द लिखती हूँ बेजुबां लबो की आवाज लिखती हूँ जो सुन सको तुम भी वो ख़ामोशी  तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं रेखा ~

मुस्कान में अभिनय क्यों है ?

आँसुओ में सच्चाई मुस्कान में अभिनय क्यों है कहते है ज़िंदा है तो ज़िन्दगी से बेज़ार क्यों है लिखा नहीं ज़िन्दगी में साथ जिनका उन्हीं से हर मोड़ पे खुदा मिलवाता क्यों है   बेज़ुबां मूर्तियों के आगे भरे करोडो के भंडारे है उसी की देहलीज पे नन्हे हाथ तरसते क्यों है देखी है मैंने भी शहरो की चमक धमक पर इस रौशनी में चेहरे पहचानने मुश्किल क्यों है कहते है वो ज़माना गया जब मोहोब्बत सच्ची होती थी फिर आज भी सूखे हुए फूल किताबो में मिलते क्यों है.. रेखा सुथार