बरिस्ता में बैठ के कॉफी
का कप हाथ में लिए
याद आ रहे है वो
सर्दी के सुहाने दिन जब
नुक्कड़ की दुकान पर
चाचा कुल्हड़ में चाय
दे जाते थे और साथ में दो-चार
बिस्किट भी ले आते थे
उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ
वो अखबार के पन्ने
और साथ ही दोस्तों का हुजूम
न जाने कहाँ गुम हो गया
वो चाय का स्वाद वही रह गया
और अब,
सबकुछ इस वातानुकूलित
बक्से में सिमट के रह गया ~
रेखा सुथार

Comments
शुक्रिया सर :)
चाय की चाह में गजब कशिश है, आइये पीजिये।