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"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी 
का कप हाथ में लिए 
याद आ रहे है वो 
सर्दी के सुहाने दिन जब 
नुक्कड़ की दुकान पर
चाचा कुल्हड़ में चाय 
दे जाते थे और साथ में दो-चार
बिस्किट भी ले आते थे
उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ
वो अखबार के पन्ने
और साथ ही दोस्तों का हुजूम
न जाने कहाँ गुम हो गया
वो चाय का स्वाद वही रह गया
और अब,
सबकुछ इस वातानुकूलित
बक्से में सिमट के रह गया ~

रेखा सुथार

Comments

अति उत्तम , अब ब्लॉग पर भी आ गए ???
स्वागत है
Rekha suthar said…
जी,एक दीदी ने कहा के मुझे ब्लॉग पर भी लिखना चाहिए तो शुरू कर दिया..

शुक्रिया सर :)
Rekha suthar said…
शुक्रिया एम्. एल. सर :)
k m dubey sagar said…
ले आया मन अब फिर उसी नुक्कड़ पर, लीजिये,
चाय की चाह में गजब कशिश है, आइये पीजिये।
Rekha suthar said…
आहा..क्या बात है :D

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