वो हँसती है वो रोती है
वो गाती है वो मुस्काती है
वो हर रंग मैं ढल जाती है
वो कहाँ कठपुतली हैं ?
वो सहती है कुछ ना कहती है
मन के भावो को बस शब्दों में पिरोती है
पत्थर नही वो तो जज्बाती है
वो कहाँ कठपुतली है ?
सिर्फ कंठ ही नीला नहीं है वरन,
घूंट जहर के वो हर दम पीती है
दांव पे लगा के वो अपने वजूद को
अपनों की ख़ुशीयाँ सींचती है
वो कहाँ कठपुतली है ?
कर्त्तव्य, दायित्व और समाज
के बंधन में मात्र बंधी हुई है
पर सांस फिर भी तो लेती है
तो बोलो भला, वो कहाँ कठपुतली है ?

Comments
Jo chahe ....'WOH' ~ bann jaaye !!