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वो फिर दुबारा मुझे कभी नहीं दिखी..

वो हर सुबह 9.38 की फ़ास्ट लोकल में मिलती थी मुझे।
रोज कुछ न कुछ नया लाती थी बेचने के लिए उसकी उम्र यही कोई 20-21 साल की होगी ।

एकदिन मैंने ही पूछा था उससे - 'तुम रोज-रोज नई-नई चीजें बेचने को कहा से लाती हो' ?
उसने मुस्कराकर जवाब दिया - 'बेचने के लिए जो वो लोग देते है वही लाना पड़ता है ना दीदी'।

मैं हर रोज चर्नी रोड स्टेशन से मेरी नियमित ट्रेन 9.38 की फ़ास्ट लोकल में चढ़ती और वो एक स्टेशन बाद मुम्बई सैंट्रल से।
ट्रेन में चढ़ते ही वो अपना बेचने के लिए लाया हुआ सामान हैंगर में टांगती फिर कुछ पल रुककर वो मुझे तलाशती उसकी नज़रें मुझपर टिकते ही उसकी आँखें चहक उठती वैसे ही जैसे विदेश में कोई अपने देश का कोई शख्स मिल जाए तब कैसे बिना कोई जान पहचान के हम उन्हें देखकर चहक उठते है हमे बेवजह ही वो एकदम से अनजान इंसान अपना सा लगने लगता है।
वो मुस्कराते चेहरे से इशारे में मुझे हेलो कहती और मैं भी उसे जवाब में एक मुस्कान दे देती फिर वो अपना सामान बेचने में मशगूल हो जाती और मैं फिर से  किताब पढ़ने में डूब जाती।
शनिवार (second) को ऑफिस की छुट्टी होती है तो उसदिन एक साथ दो दिन की छुट्टी आ गयी।

दो दिन बाद सोमवार को जैसे ही उसने मुझे देखा तो सामान बिना टांगे ही मेरे पास आई और बोली - 'आप दो दिन से दिखे नहीं मैंने ढूंढा था खूब आपको'  

'शनिवार-रविवार की छुट्टी थी ऑफिस की इसलिए नहीं आयी' - मैंने जवाब दिया।

उसने अपनी हथेली को हल्के से माथे पे दे मारा और बोली - 'अच्छा तभी आप नहीं आए मुझे तो चिंता होने लग गयी थी हम लोग के क्या है कोई शनिवार-रविवार नहीं होता तो ध्यान ही नहीं आया'
उसने हँसते हुए ये बात कही पर मुझे इस बात पे हँसी नहीं आयी मैं चुप रही।
मैंने उसके लिए दो कुर्ते लाये थे जो पड़े थे मेरे पास कबसे पर कभी पहने नहीं थे।
'थेंक यू दीदी कहके उसने वो कुर्ते अपने बैग में रख दिये थे'
फिर वो अपने काम मे लग गयी और मैं अपने।
अगले दिन वो वही कुर्ता पहन के आयी थी मैंने उसे ट्रेन रुकने से पहले ही खिड़की से देख लिए था। अंदर चढ़ते ही उसकी नज़रे मुझसे ही मिली मैंने हाथ के इशारे से उसको कहा - 'मस्त लग रही हो'
वो मुस्कराई थी।
आज सामान के साथ उसकी गोद मे एक बच्चा भी था जिसे दुपट्टे से उसने अपने सीने से बांध रखा था वो सामान टांग के मेरे पास आई उसके कुछ कहने से पहले मैंने पूछ लिया - 'ये बच्चा किसका है' ?
'मेरा है दीदी' - उसने रोज की तरह मुस्कराकर जवाब दिया।
मैं ये जवाब सुनकर हैरान हो गयी मेरी हैरानी जायज़ थी वो सिर्फ 19 साल की थी (बातों-बातों में एकबार बताया था उसने) एकदम बच्ची सी मैं बस उसे हैरानी से देखती रही।
'दीदी मैं इसे यहाँ आपके पास लेटा दु कुछ देर के लिए'? - 'उसने प्यार से कहा।
'हां बिल्कुल लेटा दो' मैंने भी मुस्करा के कहा

वो बहुत प्यारा बच्चा था मैंने उस बच्चे के साथ एक तस्वीर भी ली थी लेकिन वो मिल ही नहीं रही गैलेरी में कभी मिली तो यहाँ शेअर ज़रूर करूँगी।

उसदिन ज्यादा भीड़ नहीं थी तो वो मेरे पास आके बैठ गयी बोली - 'मेरे लिए अम्मा ने नया रिश्ता देखा है सुना है पैसे वाले है वो लोग इस शादी के बदले कुछ पैसे देने वाले है तो अम्मा-बाबा तुरंत मान गए लेकिन उन्होंने बच्चा साथ मे ना लाने की शर्त रखी है। 
उसकी दो बीवियों को छोड़ चुका है मेरे से तीसरी शादी होगी कहते हुए एक गंभीर सी मुस्कान थी उसके चेहरे पे।
वो शिकायत नहीं कर रही थी वो बस इतना सोच रही थी कि जो पैसा मिलेगा उससे शायद उसके घर वालों की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी उसको ये सब बहुत आम सा लग रहा था जैसे कि उसने ये सारी होने वाली अनहोनियां जन्म के साथ ही स्वीकार कर ली थी ।

पर मेरे लिए ये सब सुनकर स्वीकार कर पाना उतना आसान नहीं था।
मेरा स्टेशन आ गया था मैंने उसके गालों को सहलाया और फिर ट्रेन से उतर गयी।

अगले दिन से दो दिन का बैंक हॉलीडे था तीसरे दिन मैं वही 9:38 की फ़ास्ट लोकल में थी मुम्बई सेंट्रल आते ही मैंने खिड़की से बाहर झांक कर देखा पर वो नहीं दिखी मैंने फिर भी इंतज़ार किया कि वो अंदर चढ़ते ही मुझे देखकर इशारे से हेलो कहेगी।
ट्रेन चल पड़ी सब अंदर चढ़ गए थे पर वो नहीं।

उससे कोई रिश्ता नहीं था मेरा जाने क्यों वो अंजान सी लड़की अपने मन की हर गाँठ खोल गयी थी मेरे सामने जाने क्या था ऐसा की मैं भी उसके अपनेपन के मोह में बंध सी गयी थी। 
वो फिर दुबारा मुझे कभी नहीं दिखी मैंने उससे कभी उसका नाम भी नहीं पूछा था ज़रूरत भी नहीं लगी कभी,पर उसकी वो मुस्कराहट मुझे हमेशा याद रहेगी वो हमेशा एक खूबसूरत लम्हे की तरह मेरे ज़हन में बसी रहेगी।
............................  रेखा सुथार
#किस्से_लोकल_के

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