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कुम्भलगढ़ जाए तो जंगल सफ़ारी करना ना भूले

मुझे जंगल और पहाड़ों ने हमेशा ही अपनी और आकर्षित किया है वहा होकर मैं खुद को मंत्रमुग्ध सा महसूस करती हूं। जंगल के रास्तों ने कभी भी अजनबीपन नहीं महसूस करवाया एक अलग ही खींचाव सा लगता है इनके साथ।
पिछले दिनों अपने गाँव के ही जंगल की तरफ गए थे यूं तो ये जंगल मुझे बचपन से जानता है जब मैं जिद करके कई बार अपनी दादी,आंटी, मम्मी संग निकल पड़ती थी पर पहले नहीं मालूम था मुझे की क्यों मुझे जंगल मे जाना इतना पसंद है लेकिन अब .. अब मैं जानती हूं कि मुझे जंगल क्यों इतने आकर्षित करते है।
ये जो तस्वीरों में जंगल दिख रहा है इसे 'कुम्भलगढ़ वन अभ्यारण' कहते है जो भी एडवेंचर प्रेमी कुम्भलगढ़ किला देखने को आते है वो इस जंगल मे सफारी करना नहीं भूलते ये दस किलोमीटर की जंगल सफारी इतनी रोमांचक होती है कि उन चंद घंटों के दौरान आप भूल जाएंगे कि इससे बाहर भी कोई दुनिया है या फिर आप चाहेंगे ही नहीं कि इससे बाहर कोई दुनिया हो भी ।
जंगल सफारी करने का सबसे महत्वपूर्ण जो कारण होता है वो है जंगली जानवरों को देखना यही सबसे बड़ी वजह होती है कि हम जंगल सफारी करना चाहते है लेकिन जो सबसे बड़ी वजह होती है उसे हम नकार लेते है वो है जंगल की खूबसूरती और उस जंगल के सन्नाटे से आती जानवरों की तरह-तरह की धुन में बजती आवाज़ें जिसपे थिरक उठने का मन करता।
वहा ऐसे कई रहस्यमयी छोटे-छोटे तालाब है जिसका पानी बिल्कुल कृष्टल क्लियर और एकदम मीठा है जैसे कोई अंदर कैंट की मशीन लगा गया हो।
जंगल मे चहलकदमी करते हुए हम एक पुरसुकून अजीब से सन्नाटे के इर्दगिर्द खुद को भीतर से बेहद शांत और सहज पाते है।
जंगल के बीचोबीच आकर हमारे जिप्सी चालक और गाइड महिवर्धन सिंघजी ने ऊपर पहाड़ की नोक पर दिख रहे कुम्भलगढ़ के किले की और इशारा करते हुए कहा कि - 'जब पुराने समय मे राजा-महाराजा इस जंगल मे शिकार करने आते थे तब वे लगातार कुछ दिन जंगल मे रहकर शिकार करते थे और महल में रिवाज था कि रानी राजा के भोजन करने के बाद ही भोजन करती थी ये लगभग नियम की तरह था तो ऐसे में राजा के भोजन करने के बाद यहाँ जंगल से कोई तेज चमकदार धातु से ऊपर किले की तरफ मैसेज दिया जाता था उस चमक का मतलब होता था कि राजा ने भोजन कर लिया है।

ये कथा सुनकर मैं सोच में पड़ गयी थी कि इतने मजबूत इतिहास की कुछ कितनी कमजोर परंपराएं थी।

अब कुम्भलगढ़ के जंगल की सबसे दिलचस्प और ज़रूरी बात बताती हूं ये जंगल वही जंगल है जहाँ मैं बचपन मे अपनी दादी और मम्मी के साथ जाया करती थी पैदल।
दरअसल कुम्भलगढ़ मेरे गाँव से अगर जंगल की तरफ से होकर जाए तो ये महज दस किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है और बाई रोड जाने पर करीब 45 किलोमीटर..है ना दिलचस्प बात 
महिवर्धन सिंह जी जिन्होंने हमे सफारी करवाई वो इस जंगल मे करीब 7-8 साल से जंगल सफारी करवा रहे इस जंगल के बारे में काफी अच्छी जानकारी है उन्हें और कई दिलचस्प कहानियां भी ऐसी कहानियां जिनमे खो जाने का मन करता और इनकी तूफानी ड्राइविंग ने तो हमे दिन में तारे दिखा दिए थे।

दिनभर सफारी के बाद हम (कजिन्स) कुम्भलगढ़ में जंगल के बीचोबीच पहाड़ के सबसे ऊंचे टीले पर बने एक शानदार कॉटेज में रुके थे वहा के नजारे की तो क्या ही बात बताऊ बिल्कुल जन्नत सा था।

रात में वहा से नीचे की तरफ आसपास के सारे गाँव जगमगा रहे थे जिसमे एक मेरा भी गाँव है बिल्कुल वैसे ही जैसे रात में मसूरी के पहाड़ से देखने पर नीचे देहरादून जगमगाता हुआ दिखाई देता है।

"कभी-कभी ये जंगल का सूनापन मुझे मेरे मन की तरह लगता है ऊपर से शांत और अंदर खुद में ही बेहद उलझा हुआ"
Rekha Suthar

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