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उम्मीदों का सफ़र




चलती गई छनती रही 
राह के काँटों को  बीनती रही 
मुश्किलो का थाम के दामन
खुशियों को न्यौछावर करती रही 
मेरे हिस्से में भी होगी खुशियाँ रत्ती भर
इसी ख्वाहिश में वक़्त के संग बहती रही 
मेरे अंदर भी उमड़ रहा है एक सैलाब जज्बात का
वक़्त आएगा मेरा भी ये खुद को हौसला देती रही 
मंजिल की तलाश में निकले थे ये कदम घर से
रास्तो ने दिया इतना प्यार के मंजिल ही भूल गयी 
अंधेरो ने डराना चाहा बहुत के मुसाफिर कमजोर होगा
और मैं मुस्कराती माँ की दुआओ संग चलती रही

रेखा सुथार





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