उस दिन मेहबूब स्टूडियो में सुशांत अपनी एक फ़िल्म का प्रमोशन करने आए थे। ख़ुशक़िस्मती से मैं भी वहाँ दर्शक बनकर पहुँची थी। पहले अक्सर मैं अपने साथ एक डायरी रखती थी, जिसमें किसी की कही अच्छी बातों को नोट करती थी। करीब 1 घंटे के प्रोग्राम के बाद सभी वहाँ से निकल गए थे। मैं भी नीचे गेट तक पहुँची ही थी कि मुझे याद आया कि मैं अपनी डायरी उसी हॉल में भूल आई हूँ, तो तुरंत भागकर उसे लेने गई। डायरी लेकर जब लौटी, तो देखा—सुशांत वहीं थोड़ी दूर अपनी वैनिटी वैन के गेट पर खड़े थे। बेहद आम सा दिखने वाला एक लड़का, जिसमें कुछ ऐसा था जो उसे सबसे ख़ास बना देता था। उसकी सादगी देखकर मैं ठिठक गई, नज़रें हटानी चाहीं, पर न हटा सकी। शायद पहली बार जाना कि किसी को ताड़ना क्या होता है। उसकी तरफ़ जाने को कदम बढ़ाए ही थे कि उसके गार्ड ने मुझे रोक लिया। मेरी गार्ड से होती बातचीत देख सुशांत की नज़र मुझ पर पड़ी, तो मैंने इशारे से उसे मिलने के लिए कहा। सुशांत ने गार्ड को इशारा करते हुए कहा, “आने दो उसे।” और मैं लगभग भागते हुए उसके पास जा पहुँची। ऐसा नहीं है कि मैं सुशांत की बहुत बड़ी फैन हूँ, लेकिन उसकी मासूम...