वक़्त जब बेवजह , बेरहम हो जाता है, लबो पर खामोशियों का, पहरा सा होता है, मजबूरियां भी, बिखर जाती है जब आस पास, वजूद जब अपने होने का, सबूत मांगता है, तब कुछ नन्हे से लफ्ज़, दबे पाँव मेरे पास, आ कर मुझसे कहते है, "ला अपना सारा बोझ कुछ देर को हमको दे दे" रेखा