बरिस्ता में बैठ के कॉफी का कप हाथ में लिए याद आ रहे है वो सर्दी के सुहाने दिन जब नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार