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Showing posts from August, 2015

"नुक्कड़ की चाय"

बरिस्ता में बैठ के कॉफी  का कप हाथ में लिए  याद आ रहे है वो  सर्दी के सुहाने दिन जब  नुक्कड़ की दुकान पर चाचा कुल्हड़ में चाय  दे जाते थे और साथ में दो-चार बिस्किट भी ले आते थे उफ्फ ! वो चाय की चुस्कियाँ वो अखबार के पन्ने और साथ ही दोस्तों का हुजूम न जाने कहाँ गुम हो गया वो चाय का स्वाद वही रह गया और अब, सबकुछ इस वातानुकूलित बक्से में सिमट के रह गया ~ रेखा सुथार

"वजूद"

 गुमान था बहुत उसे अपने वजूद पे जरा सी ठोकर क्या लगी बिखर ही गया जैसे हैरान भी है,वो थोडा परेशान भी है कई हादसों के बाद भी जिसे आँच ना आने दी वो चंद शब्दों की कटारों से बिखरा कैसे ? कुछ खुद्दारी के बीज कुछ आत्मसम्मान की फसले थी जरा सी बारिश में ये खेत उजड़ा कैसे ? बुझ चुके है दिल में उम्मीदों के वो तमाम चिराग  घूँट जहर का पीने पर भी वो ज़िंदा कैसे ? रेखा सुथार

"बेनाम रिश्ता" (short_story)

"बेनाम रिश्ता" आज ज़िन्दगी के वो सीलन भरे हुए सारे बेरंग पन्ने आस पास यूँ बिखर गए जैसे बरसो पहले बिखरा था मैं जर्रा जर्रा उससे बिछड़ के... कोई रिश्ता नही था उससे मेरा पर वो अजनबी न जाने कब सांसो की जरुरत बन गई थी.. वो जब भी मेरे सामने आती थी तो बोतल बड़ी हैरानी से मुझे देखती थी `कि बिना उसको हाथ लगाये में नशे में झूम रहा हूँ.. तुम्हारे साथ बिताये उन सारे पलो को अपनी डायरी में रंगीन स्याही से कैद कर लिया था.. जायदाद के रूप में आज उसके सिवा कोई कीमती चीज नही मेरे पास.. जगजीत साब की वो गजल सुनी  "जिस्म की बात नही थी उन के, दिल तक जाना था, लंबी दूरी तय करने मे, वक़्त तो लगता है"  मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता रह गया और वो किसी और घर की इज्जत बन गई..  उंगलियाँ आज भी बस इस सोच में गुम हैं कि कैसे उसने नए हाथ को थामा होगा ? रेखा सुथर ~