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मुस्कान में अभिनय क्यों है ?

आँसुओ में सच्चाई मुस्कान में अभिनय क्यों है
कहते है ज़िंदा है तो ज़िन्दगी से बेज़ार क्यों है

लिखा नहीं ज़िन्दगी में साथ जिनका
उन्हीं से हर मोड़ पे खुदा मिलवाता क्यों है  

बेज़ुबां मूर्तियों के आगे भरे करोडो के भंडारे है
उसी की देहलीज पे नन्हे हाथ तरसते क्यों है

देखी है मैंने भी शहरो की चमक धमक
पर इस रौशनी में चेहरे पहचानने मुश्किल क्यों है

कहते है वो ज़माना गया जब मोहोब्बत सच्ची होती थी
फिर आज भी सूखे हुए फूल किताबो में मिलते क्यों है..
रेखा सुथार

Comments

vishnu said…
This comment has been removed by the author.
vishnu said…
बिलकुल सही कहां !
Rekha suthar said…
शुक्रिया vishnu जी
Bhaskar joshi said…
सुन्दर बहुत खूब ..
Rekha suthar said…
बहुत बहुत शुक्रिया पं. भास्कर जोशी जी :)

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