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Showing posts from September, 2015

"अमृता-ईमरोज़" एक अनोखा अनकहा अहसास ~

"अमृता-ईमरोज़" कहते है दफनाने के बाद सारे रिश्ते चंद दिनों में ख़त्म हो जाते है । जिसने भी कहा है झूठ कहा है | उन्हें हम बताएँगे कि जब रिश्ता रुह का रूह से होता है तो जिस्म भले ही राख हो जाए रूहानी रिश्ते ख़ाक नहीं होते | दुनिया के लिए भले ही तुम नहीं रही,  पर मेरे लिए तुम कल भी यहीं थी और आज भी यहीं मौजूद हो | घर के हरेक हिस्से में तुम्हारी मौजूदगी का अहसास होता है । यहाँ हर कोने में तुम ही तुम बसी हो । जब भी नंगे पैर मैं सैर करने निकलता हूँ तो साथ में दो कदमो के टहलने की आहट महसूस करता हूँ और अपने दाहिने हाथ पर हल्का  सा दबाव और गर्माहट का अहसास होता है । कभी कभी जब मैं अल्हड़पन में स्कूटर लेकर निकल पड़ता हूँ तब तुम्हारी उंगलिया मेरी पीठ पर आज भी "वही" नाम लिखती है और फिर आहिस्ते से तुम्हारे माथे का मेरी पीठ पर सहारा लेकर टिक जाना मुझे आज भी उतना ही सुकून देता है । मैं जानता था मेरे नसीब की बारिशें किसी और की छत पर हो रही है, फिर भी तुम्हारे एहसास की वो चंद बूंदें भी मुझे हर लम्हे तरोताजा रखती थी । आज भी मैं तुमसे वही बचकानी सी बातें किया करता हूँ और तुम ...

रौशनी

तेरे बाद कभी इस दिल में  रौशनी आने ही नही दी वरना टिमटिमाये तो थे कई सितारे दिल का अँधेरा मिटाने को ~ रेखा ~ "फ़ोटो गूगल से साभार"

उम्मीदों का सफ़र

चलती गई छनती रही  राह के काँटों को  बीनती रही  मुश्किलो का थाम के दामन खुशियों को न्यौछावर करती रही  मेरे हिस्से में भी होगी खुशियाँ रत्ती भर इसी ख्वाहिश में वक़्त के संग बहती रही  मेरे अंदर भी उमड़ रहा है एक सैलाब जज्बात का वक़्त आएगा मेरा भी ये खुद को हौसला देती रही  मंजिल की तलाश में निकले थे ये कदम घर से रास्तो ने दिया इतना प्यार के मंजिल ही भूल गयी  अंधेरो ने डराना चाहा बहुत के मुसाफिर कमजोर होगा और मैं मुस्कराती माँ की दुआओ संग चलती रही रेखा सुथार