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Showing posts from July, 2015

"मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं"

~ मैं नहीं जानती कैसी हूँ मैं ना मैं शायर हूँ ना कवि हूँ मैं लिखा जो कभी दिल को छु जाए तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना प्यार लिखती हूँ ना नफरत लिखती हूँ  जो कभी पढ़ लो जज्बात तुम तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना सच लिखती हूँ ना झूठ लिखती हूँ  जो जैसा दीखता है वैसा ही लिखती हूँ दिख जाए जो सादगी लफ़्ज़ों की तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं ना जख्म लिखती हूँ ना दर्द लिखती हूँ बेजुबां लबो की आवाज लिखती हूँ जो सुन सको तुम भी वो ख़ामोशी  तो समझ लेना तेरे जैसी हूँ मैं रेखा ~

"वो कहाँ कठपुतली है" ?

वो हँसती है वो रोती है वो गाती है वो मुस्काती है वो हर रंग मैं ढल जाती है वो कहाँ कठपुतली हैं ? वो सहती है कुछ ना कहती है मन के भावो को बस शब्दों में पिरोती है पत्थर नही वो तो जज्बाती है वो कहाँ कठपुतली है ? सिर्फ कंठ ही नीला नहीं है वरन, घूंट जहर के वो हर दम पीती है दांव पे लगा के वो अपने वजूद को अपनों की ख़ुशीयाँ सींचती है वो कहाँ कठपुतली है ? कर्त्तव्य, दायित्व और समाज के बंधन में मात्र बंधी हुई है पर सांस फिर भी तो लेती है तो बोलो भला, वो कहाँ कठपुतली है ?